अध्याय 1 खण्ड 1 - मन्त्र 2

स इमाँल्लोकानसृजत ।
अम्भो मरीचीर्मरमापोदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥

sa imā~llokānasṛjata .
ambho marīcīrmaramāpodo’mbhaḥ pareṇa divaṃ dyauḥ pratiṣṭhāntarikṣaṃ marīcayaḥ pṛthivī maro yā adhastāttā āpaḥ .. 2 ..


उसने अम्भ, मरीचि, मर और आप—इन लोकोंकी रचना की । जो द्युलोकसे परे है और स्वर्ग जिसकी प्रतिष्ठा है वह ‘अम्भ’ है, अन्तरिक्ष (भुवर्लोक) ‘मरीचि’ है, पृथिवी ‘मरलोक’ है और जो [पृथिवी] नीचे है वह ‘आप’ है ॥ २ ॥

उस आत्माने इन लोकोंकी रचना की । जिस प्रकार इस लोकमें बुद्धिमान् शिल्पकार आदि ‘मैं इस प्रकारके महल आदि बनाऊँ’ ऐसा विचार करके उस विचारके अनन्तर ही महल आदिकी रचना करते हैं उसी प्रकार [उसने ईक्षण करके इन लोकादिकी रचना की]。

शंका—शिल्पकारादि तो उन महल आदिकी उपादान सामग्रीसे युक्त होते हैं इसलिये वे महल आदिकी रचना करते हैं—ऐसा कहना ठीक ही है; किन्तु उपादान (सामग्री)से रहित आत्मा किस प्रकार लोकोंकी रचना करता है?

समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि जलमें [व्यक्त न हुए] फेनस्थानीय अव्याकृत नाम और रूप, जो आत्मस्वरूप और एकमात्र ‘आत्मा’ शब्दके ही वाच्य हैं, व्याकृत फेनस्वरूप जगत्के उपादान हो सकते हैं । अतः वह सर्वज्ञ आत्मा अपने आत्मभूत नाम और रूपका उपादानस्वरूप होकर जगत्की रचना करता है—इसमें कोई विरोध नहीं है ।

अथवा जिस प्रकार बुद्धियुक्त मायावी कोई उपादान न होनेपर भी स्वयं अपनेहीको अपने अन्यरूपसे आकाशमें चलता हुआ-सा बना लेता है, उसी प्रकार वह सर्वशक्तिमान्, महामायावी, सर्वज्ञ देव अपनेहीको जगत्रूप अपने अन्य स्वरूपसे रच लेता है—यह बहुत युक्तियुक्त ही है । ऐसा होनेपर कार्य और कारण—इन दोनोंको असत् बतलानेवालोंके [असद्वाद आदि] पक्षोंकी प्राप्ति नहीं होती और उनका पूर्णतया निराकरण हो जाता है ।

उसने किन लोकोंकी रचना की? इसपर कहते हैं—अम्भ, मरीचि, मर और आप आदि की । उसने आकाशादिक्रम से अण्ड को उत्पन्न कर अम्भ आदि लोकों की रचना की । उन अम्भ आदि लोकों की श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है ।

अदः—वह ‘अम्भ’ शब्द से कहा जानेवाला लोक है, जो द्युलोक से परे है; वह जल (मेघों) को धारण करनेवाला होने से ‘अम्भ’ शब्द से कहा जाता है । उस अम्भलोक का द्युलोक प्रतिष्ठा यानी आश्रय है । द्युलोक से नीचे जो अन्तरिक्ष है वह मरीचिलोक है । वह एक होने पर भी अनेकों स्थानभेदों के कारण ‘मरीचयः’ इस प्रकार बहुवचनरूप से प्रयुक्त हुआ है । अथवा किरणों से सम्बन्धित होने के कारण वह ‘मरीचि’ कहलाता है । पृथ्वी ‘मर’ है; क्योंकि उसमें प्राणी मरते हैं । जो लोक पृथ्वी से नीचे की ओर हैं वे ‘आप’ कहलाते हैं; क्योंकि ‘अप्’ शब्द [नीचे के लोकों में रहनेवाले प्राणियों द्वारा प्राप्य होने के कारण प्राप्तिरूप अर्थवाले] ‘आप्’ धातु से बना हुआ है । यद्यपि सभी लोक पंचभूतमय हैं तथापि अम्भ, मरीचि, मर और आप—ये लोक आप (जल) की अधिकता होने के कारण ‘आप’ ही कहे जाते हैं ॥ २ ॥

तात्पर्य पढ़ें

स आत्मेमाँल्लोकानसृजत सृष्टवान् । यथेह बुद्धिमांस्तक्षादिरेवंप्रकारान्प्रासादादीन्सृज इति ईक्षित्वेक्षानन्तरं प्रासादादीन्सृजति तद्वत् ।

ननु सोपादानस्तक्षादिः प्रासादादीन्सृजतीति युक्तं निरुपादानस्त्वात्मा कथं लोकान् सृजति?

नैष दोषः; सलिलफेननिरुपादानस्य स्थानीये आत्मभूते आत्मनः सृष्टि- नामरूपे अव्याकृते कर्तृत्वम् आत्मैकशब्दवाच्ये व्याकृतफेनस्थानीयस्य जगत उपादानभूते सम्भवतः । तस्माद् आत्मभूतनामरूपोपादानभूतः सन्सर्वज्ञो जगन्निर्मिमीत इत्यविरुद्धम् ।

अथवा, यथा विज्ञानवान्मायावी निरुपादान आत्मानमेव आत्मान्तरत्वेनाकाशेन गच्छन्तमिव निर्मिमीते, तथा सर्वज्ञो देवः सर्वशक्तिर्महामाय आत्मानमेवात्मान्तरत्वेन जगद्रूपेण निर्मिमीत इति युक्ततरम् । एवं च सति कार्यकारणोभयासद्वाद्यादिपक्षाश्च न प्रसज्जन्ते सुनिराकृताश्च भवन्ति ।

काँल्लोकानसृजतेत्याह—

आत्मसृष्ट- अम्भो मरीचीर्मरमाप लोकाख्यानम् इति । आकाशादिक्रमेण अण्डमुत्पाद्याम्भःप्रभृतीन् लोकानसृजत । तत्राम्भःप्रभृतीन् स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः ।

अदस्तदम्भःशब्दवाच्यो लोकः परेण दिवं द्युलोकात्परेण परस्तात्; सोऽम्भःशब्दवाच्यः, अम्भो भरणात् । द्यौः प्रतिष्ठाश्रयस्तस्याम्भसो लोकस्य । द्युलोकादधस्तादन्तरिक्षं यत्तन्मरीचयः । एकोऽप्यनेकस्थानभेदत्वाद्बहुवचनभाक्—मरीचय इति; मरीचिभिर्वा रश्मिभिः सम्बन्धात् । पृथिवी मरो म्रियन्तेऽस्मिन् भूतानीति । या अधस्तात् पृथिव्यास्ता आप उच्यन्ते; आप्नोतेः, लोकाः । यद्यपि पञ्चभूतात्मकत्वं लोकानां तथाप्यबाहुल्यादब्नामभिरेवाम्भो मरीचीर्मरमाप इत्युच्यन्ते ॥ २ ॥


पुरुषरूप लोकपाल की रचना

सम्पूर्ण प्राणियों के कर्मफलरूप उपादान के अधिष्ठानभूत चारों लोकों की रचना कर—
तात्पर्य पढ़ें
सर्वप्राणिकर्मफलोपादानाधिष्ठानभूतांश्चतुरो लोकान् सृष्ट्वा—