अध्याय 1 खण्ड 1 - मन्त्र 3

स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥

sa īkṣateme nu lokā lokapālānnu sṛjā iti so’dbhya eva puruṣaṃ samuddhṛtyāmūrchayat .. 3 ..


उसने ईक्षण (विचार) किया कि—‘ये लोक तो तैयार हो गये, अब लोकपालों की रचना करूँ’—ऐसा सोचकर उसने जल में से ही एक पुरुष निकालकर अवयवयुक्त किया ॥ ३ ॥

उस ईश्वर ने फिर भी ईक्षण (विचार) किया । मेरे रचे हुए ये अम्भ आदि लोक बिना किसी रक्षक के नष्ट हो जायँगे । अतः इनकी रक्षा के लिये मैं लोकपालों की—लोकों की रक्षा करनेवालों की रचना करूँ ।

ऐसा सोचकर उसने जल से—जलप्रधान पंचभूतों से अर्थात् जिनसे उसने अम्भ आदि लोकों की रचना की थी उन्हीं से पुरुष यानी सिर और हाथ आदिवाले पुरुषाकार को, जिस प्रकार कुम्हार पृथिवी से मिट्टी का पिण्ड निकालता है, उसी प्रकार निकालकर मूर्छित किया अर्थात् अवयवों की योजनाकर उसको बढ़ाया ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स ईश्वरः पुनरेवैक्षत । इमे नु अम्भःप्रभृतयो मया सृष्टा लोकाः परिपालयितृवर्जिता विनश्येयुः, तस्मादेषां रक्षणार्थं लोकपालाँल्लोकानां पालयितॄन्नु सृजै सृजेऽहमिति ।

एवमीक्षित्वा सोऽद्भ्य एव अप्प्रधानेभ्य एव पञ्चभूतेभ्यो येभ्योऽम्भःप्रभृतीन्सृष्टवांस्तेभ्य एवेत्यर्थः । पुरुषं पुरुषाकारं शिरःपाण्यादिमन्तं समुद्धृत्य अद्‌भ्यः समुपादाय मृत्पिण्डमिव कुलालः पृथिव्याः, अमूर्छयन्मूर्छितवान् संपिण्डितवान् स्वावयवसंयोजनेनेत्यर्थः ॥ ३ ॥


इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओं की उत्पत्ति

तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं

tamabhyatapattasyābhitaptasya mukhaṃ nirabhidyata yathāṇḍaṃ