sa īkṣateme nu lokā lokapālānnu sṛjā iti so’dbhya eva puruṣaṃ samuddhṛtyāmūrchayat .. 3 ..
उस ईश्वर ने फिर भी ईक्षण (विचार) किया । मेरे रचे हुए ये अम्भ आदि लोक बिना किसी रक्षक के नष्ट हो जायँगे । अतः इनकी रक्षा के लिये मैं लोकपालों की—लोकों की रक्षा करनेवालों की रचना करूँ ।
ऐसा सोचकर उसने जल से—जलप्रधान पंचभूतों से अर्थात् जिनसे उसने अम्भ आदि लोकों की रचना की थी उन्हीं से पुरुष यानी सिर और हाथ आदिवाले पुरुषाकार को, जिस प्रकार कुम्हार पृथिवी से मिट्टी का पिण्ड निकालता है, उसी प्रकार निकालकर मूर्छित किया अर्थात् अवयवों की योजनाकर उसको बढ़ाया ॥ ३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स ईश्वरः पुनरेवैक्षत । इमे नु अम्भःप्रभृतयो मया सृष्टा लोकाः परिपालयितृवर्जिता विनश्येयुः, तस्मादेषां रक्षणार्थं लोकपालाँल्लोकानां पालयितॄन्नु सृजै सृजेऽहमिति ।
एवमीक्षित्वा सोऽद्भ्य एव अप्प्रधानेभ्य एव पञ्चभूतेभ्यो येभ्योऽम्भःप्रभृतीन्सृष्टवांस्तेभ्य एवेत्यर्थः । पुरुषं पुरुषाकारं शिरःपाण्यादिमन्तं समुद्धृत्य अद्भ्यः समुपादाय मृत्पिण्डमिव कुलालः पृथिव्याः, अमूर्छयन्मूर्छितवान् संपिण्डितवान् स्वावयवसंयोजनेनेत्यर्थः ॥ ३ ॥
इन्द्रियगोलक, इन्द्रिय और इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओं की उत्पत्ति
tamabhyatapattasyābhitaptasya mukhaṃ nirabhidyata yathāṇḍaṃ