अध्याय 1 खण्ड 2 - मन्त्र 1

ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥

tā etā devatāḥ sṛṣṭā asmin mahatyarṇave prāpataṃstamaśanāyāpipāsābhyāmanvavārjat tā enamabruvannāyatanaṃ naḥ prajānīhi yasmin pratiṣṭhitā annamadāmeti .. 1 ..


वे ये [इस प्रकार] रचे हुए [इन्द्रियाभिमानी] देवगण इस महासमुद्र में पतित हो गये । उस (पिण्ड)-को [परमात्मा ने] क्षुधा-पिपासा से संयुक्त कर दिया । तब उन इन्द्रियाभिमानी देवताओं ने उससे कहा—हमारे लिये कोई आश्रयस्थान बतलाइये, जिसमें स्थित होकर हम अन्न भक्षण कर सकें ॥ १ ॥

ईश्वरद्वारा लोकपालरूप से संकल्प करके रचे हुए वे ये अग्नि आदि देवगण इस अति महान् संसारार्णव—संसारसमुद्र में [गिरे], जो (संसारसमुद्र) अविद्या, कामना और कर्म से उत्पन्न हुए दुःखरूप जल तथा तीव्र रोग, जरा और मृत्युरूप महाग्राहों से पूर्ण है, अनादि, अनन्त, अपार एवं निरालम्ब है, विषय और इन्द्रियों के संयोग से होनेवाला अणुमात्र सुख ही जिसकी क्षणिक विश्रान्ति का स्वरूप है, जिसमें पाँचों इन्द्रियों की विषयतृष्णारूप पवन के विक्षोभ से उठी हुई अनर्थरूप सैकड़ों उत्ताल तरंगें हैं; जहाँ महारौरव आदि अनेकों नरकों के ‘हा हा’ आदि क्रन्दन और चिल्लाहट से बड़ा कोलाहल मचा हुआ है, जिसमें सत्य, सरलता, दान, दया, अहिंसा, शम, दम और धैर्य आदि आत्मा के गुणरूप पाथेय से भरी हुई ज्ञानरूप नौका है, सत्संग और सर्वत्याग ही जिसमें [नौकाओं के आने-जाने का] मार्ग है तथा मोक्ष ही जिसका तीर है—ऐसे [संसाररूप] महासागर में पतित हुए—गिरे ।

अतः यहाँ यही अर्थ कहना इष्ट है कि ज्ञान और कर्म के समुच्चयानुष्ठान की फलस्वरूपा जिस अग्नि आदि देवता में लीन होनारूप गति की [पूर्व अध्यायों में] व्याख्या की गयी है वह भी सांसारिक दुःख की शान्ति के लिये पर्याप्त नहीं है । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये [देवतालयरूप गति संसारदुःख की शान्ति का उपाय नहीं है] ऐसा जानकर जो परब्रह्म अपना और सब प्राणियों का आत्मा है, जिसके विशेषण आगे बतलाये जानेवाले हैं और संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संसार के कारण-रूप से जिसका यहाँ प्रकरण है उसे संसार के सम्पूर्ण दुःखों की शान्ति के लिये जानना चाहिये । अतः “मोक्षप्राप्ति का और कोई मार्ग नहीं है” इस श्रुति के अनुसार यह जो परब्रह्म का आत्मस्वरूप से ज्ञान है “यही मार्ग है, यही कर्म है, यही ब्रह्म है और यही सत्य है ।”

स्थान (इन्द्रियगोलक), इन्द्रिय और इन्द्रियाभिमानी देवताओं की उत्पत्ति के बीजभूत पुरुषरूप से प्रथम उत्पन्न किये हुए उस पिण्ड अर्थात् आत्मा को उसने क्षुधा और पिपासा से अन्ववार्जित—अनुगमित अर्थात् संयुक्त किया । उस कारणभूत पिण्ड के क्षुधा आदि दोषों से युक्त होने के कारण उसके कार्यभूत देवता आदि भी क्षुधा आदि से युक्त हुए । तब क्षुधा-पिपासा से पीड़ित होकर उन्होंने उस जगद्रचयिता पितामह से कहा—‘हमारे लिये आयतन—आश्रयस्थान की व्यवस्था करो, जिस आयतन में प्रतिष्ठित होकर हम सामर्थ्यवान् हो अन्न भक्षण कर सकें’ ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ता एता अग्न्यादयो देवता लोकपालत्वेन संकल्प्य सृष्टा ईश्वरेणास्मिन्संसारार्णवे संसारसमुद्रे महत्यविद्याकामकर्मप्रभवदुःखोदके तीव्ररोगजरामृत्युमहाग्राहेऽनादावनन्तेऽपारे निरालम्बे विषयेन्द्रियजनितसुखलवक्षणविश्रामे पञ्चेन्द्रियार्थतृष्णामारुतविक्षोभोत्थितानर्थशतमहोर्मौ महारौरवाद्यनेकनिरयगतहाहेत्यादि- कूजिताक्रोशनोद्भूतमहारवे सत्यार्जवदानदयाहिंसाशमदमधृत्याद्यात्मगुणपाथेयपूर्णज्ञानोडुपे सत्सङ्गसर्वत्यागमार्गे मोक्षतीरे एतस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन्पतितवत्यः ।

तस्मादग्न्यादिदेवताप्ययलक्षणापि या गतिर्व्याख्याता ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानफलभूता सापि नालं संसारदुःखोपशमाय, इत्ययं विवक्षितोऽर्थोऽत्र । यत एवं तस्मादेवं विदित्वा परं ब्रह्म आत्मात्मनः सर्वभूतानां च यो वक्ष्यमाणविशेषणः प्रकृतश्च जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारहेतुत्वेन स सर्वसंसारदुःखोपशमनाय वेदितव्यः । तस्मात् “एष पन्था एतत्कर्मैतद्ब्रह्मैतत् सत्यम्” (ऐ० उ० २ । १ । १) यदेतत्परब्रह्मात्मज्ञानम् “नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय” (श्वे० उ० ३ । ८, ६ । १५) इति मन्त्रवर्णात् ।

तं स्थानकरणदेवतोत्पत्तिबीजभूतं पुरुषं प्रथमोत्पादितं पिण्डमात्मानमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जदनुगमितवान्संयोजितवानित्यर्थः । तस्य कारणभूतस्याशनायादिदोषवत्त्वात्तत्कार्यभूतानामपि देवतानामशनायादिमत्त्वम् । तास्ततोऽशनायापिपासाभ्यां पीड्यमाना एनं पितामहं स्रष्टारमब्रुवन्नुक्तवत्यः—आयतनमधिष्ठानं नोऽस्मभ्यं प्रजानीहि विधत्स्व । यस्मिन्नायतने प्रतिष्ठिताः समर्थाः सत्योऽन्नमदाम भक्षयाम इति ॥ १ ॥


गो और अश्वशरीर की उत्पत्ति तथा देवताओं द्वारा उनकी अस्वीकृति

ऐसा कहे जानेपर ईश्वर—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एवमुक्त ईश्वरः—