अध्याय 1 खण्ड 2 - मन्त्र 2

ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ।
ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥

tābhyo gāmānayattā abruvanna vai no’yamalamiti .
tābhyo’śvamānayattā abruvanna vai no’yamalamiti .. 2 ..


उन देवताओं के लिये गौ ले आया । वे बोले—‘यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है ।’ [फिर वह] उनके लिये घोड़ा ले आया । वे बोले—‘यह भी हमारे लिये पर्याप्त नहीं है’ ॥ २ ॥
उन देवताओं के लिये गौ—गौ के आकारवाला पिण्ड पूर्ववत् उस जल से निकालकर—अवयवों की योजनाद्वारा रचकर लाया अर्थात् उसे उन देवताओं को दिखलाया । उस गौ के समान आकारवाले प्राणी को देखकर वे पुनः बोले—‘यह पिण्ड हमारे लिये अन्न भक्षण करने के निमित्त आश्रय बनाने के लिये पर्याप्त नहीं है । ‘अलम्’ का अर्थ पर्याप्त है । अर्थात् [यह आश्रय] भोजन करने के योग्य नहीं है ।’ गौ का परित्याग कर देनेपर वह उनके लिये घोड़ा लाया । तब वे ‘हमारे लिये यह भी पर्याप्त नहीं है’ इस प्रकार पूर्ववत् कहने लगे ॥ २ ॥
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ताभ्यो देवताभ्यो गां गवाकृतिविशिष्टं पिण्डं ताभ्य एवाद्भ्यः पूर्ववत्पिण्डं समुद्धृत्य मूर्च्छयित्वानयद्दर्शितवान् । ताः पुनर्गवाकृतिं दृष्ट्वाब्रुवन्—न वै नोऽस्मदर्थमधिष्ठानायान्नमत्तुमयं पिण्डोऽलं न वै । अलं पर्याप्तः, अत्तुं न योग्य इत्यर्थः । गवि प्रत्याख्याते ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति पूर्ववत् ॥ २ ॥

मनुष्यशरीर की उत्पत्ति और देवताओं द्वारा उसकी स्वीकृति

इस प्रकार सबका त्याग कर दिया जानेपर—
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सर्वप्रत्याख्याने—