अध्याय 1 खण्ड 2 - मन्त्र 3

ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति ।
पुरुषो वाव सुकृतम् ।
ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥

tābhyaḥ puruṣamānayattā abruvan sukṛtaṃ bateti .
puruṣo vāva sukṛtam .
tā abravīdyathāyatanaṃ praviśateti .. 3 ..


वह उनके लिये पुरुष ले आया । वे बोले—‘यह सुन्दर बना है, निश्चय पुरुष ही सुन्दर रचना है ।’ उन (देवताओं से) ईश्वर ने कहा— ‘अपने-अपने आयतन (आश्रयस्थानों)-में प्रवेश कर जाओ’ ॥ ३ ॥

[वह] उनके लिये उनका योनिस्वरूप पुरुष ले आया । अपने योनिभूत उस पुरुष को देखकर वे खेदरहित हो इस प्रकार बोले—‘यह अधिष्ठान सुन्दर बना है । अतः सम्पूर्ण पुण्यकर्मों का कारण होने से निश्चय पुरुष ही सुकृत है । अथवा स्वयं अपने-आप अपनी ही माया से रचा होने के कारण ‘सुकृत’ ऐसा कहा जाता है ।’

ईश्वर में यह समझकर कि इन्हें यह आश्रयस्थान प्रिय है, क्योंकि सभी अपनी योनि में सन्तुष्ट रहा करते हैं, उन देवताओं से कहा— ‘जिसका जो आयतन है उस अपनी सम्भाषणादि क्रिया के योग्य आयतन में तुम सब प्रविष्ट हो जाओ’ ॥ ३ ॥

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ताभ्यः पुरुषमानयत्स्वयोनिभूतम् । ताः स्वयोनिं पुरुषं दृष्ट्वा अखिन्नाः सत्यः सुकृतं शोभनं कृतमिदमधिष्ठानं बतेत्यब्रुवन् । तस्मात्पुरुषो वाव पुरुष एव सुकृतं सर्वपुण्यकर्महेतुत्वात् । स्वयं वा स्वेनैवात्मना स्वमायाभिः कृतत्वात्सुकृतमित्युच्यते ।

ता देवता ईश्वरोऽब्रवीदिष्टमासामिदमधिष्ठानमिति मत्वा, सर्वे हि स्वयोनिषु रमन्ते, अतो यथायतनं यस्य यद्वदनादिक्रियायोग्यमायतनं तत्प्रविशतेति ॥ ३ ॥


देवताओं का अपने-अपने आयतनों में प्रवेश

‘ऐसा ही हो’ इस प्रकार राजा की आज्ञा पाकर जिस प्रकार नगरी में सेनाध्यक्षादि [प्रवेश कर जाते हैं उसी प्रकार]—
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तथास्त्वित्यनुज्ञां प्रतिलभ्येश्वरस्य नगर्यामिव बलाधिकृतादयः—