अध्याय 1 खण्ड 2 - मन्त्र 5

तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति ।
ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति ।
तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥

tamaśanāyāpipāse abrūtāmāvābhyāmabhiprajānīhīti .
te abravīdetāsveva vāṃ devatāsvābhajāmyetāsu bhāginyau karomīti .
tasmādyasyai kasyai ca devatāyai havirgṛhyate bhāginyāvevāsyāmaśanāyāpipāse bhavataḥ .. 5 ..


उस (ईश्वर)-से क्षुधा-पिपासा ने कहा—‘हमारे लिये आश्रय की योजना कीजिये ।’ तब [उसने] उनसे कहा—‘तुम दोनों को मैं इन देवताओं में ही भाग दूँगा अर्थात् मैं तुम्हें इन्हीं में भागीदार करूँगा ।’ अतः जिस किसी देवता के लिये हवि दी जाती है उस देवता की हवि में ये भूख-प्यास भी भागीदार होती ही हैं ॥ ५ ॥
क्षुधा और पिपासा ने आश्रयहीन होने के कारण उस ईश्वर से कहा—‘हमारे लिये अधिष्ठान का अभिप्रज्ञान—चिन्तन अर्थात् विधान करो ।’ ऐसा कहे जानेपर उस ईश्वर ने उन क्षुधा-पिपासाओं से कहा—‘भावरूप होने के कारण तुम दोनों का किसी चेतन वस्तु को आश्रय किये बिना अन्न भक्षण करना सम्भव नहीं है । अतः मैं इन अध्यात्म और अधिदैव अग्नि आदि देवताओं में ही तुम दोनों को आभाजित करता हूँ अर्थात् तुम्हारी वृत्ति का विभाग करके अनुगृहीत करता हूँ । मैं तुम्हें इन देवताओं में ही भागी करता हूँ—अर्थात् जिस देवता का जो हवि आदि भाग है उसके उसी भाग से मैं तुम्हें उनकी भागिनी—भाग ग्रहण करनेवाली बनाता हूँ; क्योंकि सृष्टि के आदि में ईश्वर ने ऐसी व्यवस्था कर दी थी, इसलिये इस समय भी जिस किसी देवता के लिये चरु-पुरोडाशादि हवि ग्रहण की जाती है, ये क्षुधा-पिपासा भी उस देवता में भागिनी होती ही हैं ॥ ५ ॥
तात्पर्य पढ़ें
निरधिष्ठाने सत्यौ अशनायापिपासे तमीश्वरमब्रूतामुक्तवत्यौ । आवाभ्यामधिष्ठानमभिप्रजानीहि चिन्तय विधत्स्वेत्यर्थः । स ईश्वर एवमुक्तस्ते अशनायापिपासे अब्रवीत् । न हि युवयोर्भावरूपत्वाच्चेतनावद्वस्त्वनाश्रित्यान्नात्तृत्वं सम्भवति । तस्मादेतास्वेवाग्न्याद्यासु वां युवां देवतास्वध्यात्मधिदेवतास्वाभजामि वृत्तिसंविभागेनानुगृह्णामि । एतासु भागिन्यौ यद्देवतयो यो भागो हविरादिलक्षणः स्यात्तस्यास्तेनैव भागेन भागिन्यौ भागवत्यौ वां करोमीति सृष्ट्यादावीश्वर एवं व्यदधाद्यस्मात्तस्मादिदानीमपि यस्यै कस्यै च देवतायै अर्थाय हविर्गृह्यते चरुपुरोडाशादिलक्षणं भागिन्यावेव भागवत्यावेवास्यां देवतायामशनायापिपासे भवतः ॥ ५ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः समाप्तः ॥ २ ॥


तृतीय खण्ड