अध्याय 1 खण्ड 3 - मन्त्र 1

स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥

sa īkṣateme nu lokāśca lokapālāścānnamebhyaḥ sṛjā iti .. 1 ..


उस (ईश्वर)-ने विचारा, ये लोक और लोकपाल तो हो गये, अब इनके लिये अन्न रचूँ ॥ १ ॥

उस ईश्वर ने इस प्रकार ईक्षण किया—किस प्रकार? [सो बतलाते हैं—] मैंने इन लोक और लोकपालों की रचना तो कर दी और इन्हें क्षुधा-पिपासा से संयुक्त भी कर दिया । अतः अन्न के बिना इनकी स्थिति नहीं हो सकती; इसलिये इन लोकपालों के लिये मैं अन्न रचूँ ।

इस प्रकार लोक में ईश्वरों (समर्थों)-की अपने लोगों के ऊपर अनुग्रह एवं निग्रह करने की स्वतन्त्रता देखी जाती है । इसी प्रकार सर्वेश्वर होने के कारण महेश्वर (परमेश्वर)-की भी सबके प्रति निग्रह एवं अनुग्रह में स्वतन्त्रता ही है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स एवमीश्वर ईक्षत, कथम्? इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्च मया सृष्टा अशनायापिपासाभ्यां च संयोजिताः, अतो नैषां स्थितिरन्नमन्तरेण । तस्मादन्नमेभ्यो लोकपालेभ्यः सृजै सृज इति ।

एवं हि लोके ईश्वराणामनुग्रहे निग्रहे च स्वातन्त्र्यं दृष्टं स्वेषु । तद्वन्महेश्वरस्यापि सर्वेश्वरत्वात्सर्वान्प्रति निग्रहानुग्रहेऽपि स्वातन्त्र्यमेव ॥ १ ॥