तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥
tadapānenājighṛkṣattadāvayat saiṣo’nnasya graho yadvāyurannāyurvā eṣa yadvāyuḥ .. 10 ..
फिर उसने इ से अपान से ग्रहण करना चाहा और इ से ग्रहण कर लिया । वह यह [अपान] ही अन्न का ग्रह (ग्रहण करनेवाला) है । जो वायु अन्नायु (अन्नद्वारा जीवन धारण करनेवाला) प्रसिद्ध है वह यह [अपान] वायु ही है ॥ १० ॥
[इसी प्रकार उसने] उस अन्न को प्राणसे, नेत्रसे, श्रोत्रसे, त्वचासे, मनसे, शिश्न से एवं भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के व्यापार से ग्रहण करने में असमर्थ होकर अन्त में उ से मुख के छिद्रद्वारा अपानवायु से ग्रहण करने की इच्छा की । तब उ से ग्रहण कर लिया; अर्थात् इस प्रकार इस अन्न को भक्षण कर लिया । उसी कारण से वह यह अपानवायु अन्न का ग्रह अर्थात् अन्न ग्रहण करनेवाला है । जो वायु अन्नायु—अन्नरूप बन्धनवाला अर्थात् अन्नरूप जीवनवाला प्रसिद्ध है वह यह [अपान] वायु ही है ॥ ४-१० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तत्प्राणेन तच्चक्षुषा तच्छ्रोत्रेण तत्त्वचा तन्मनसा तच्छिश्नेन तेन तेन करणव्यापारेणान्नं ग्रहीतुमशक्नुवन्पश्चादपानेन वायुना मुखच्छिद्रेण तदन्नमजिघृक्षत् । तदावयत्तदन्नमेवं जग्राह आशितवान् । तेन स एषोऽपानवायुरन्नस्य ग्रहोऽन्नग्राहक इत्येतत् । यद्वायुर्यो वायुरन्नायुः, अन्नबन्धनोऽन्नजीवनो वै प्रसिद्धः स एष यो वायुः ॥ ४-१० ॥
परमात्माका शरीरप्रवेशसम्बन्धी विचार
स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति ।
स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा
स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा
sa īkṣata kathaṃ nvidaṃ madṛte syāditi sa īkṣata katareṇa prapadyā iti .
sa īkṣata yadi vācābhivyāhṛtaṃ yadi prāṇenābhiprāṇitaṃ yadi cakṣuṣā dṛṣṭaṃ yadi śrotreṇa śrutaṃ yadi tvacā spṛṣṭaṃ yadi manasā