dhyātaṃ yadyapānenābhyapānitaṃ yadi śiśnena visṛṣṭamatha ko’hamiti .. 11 ..
उस परमात्माने नगर, नगरनिवासी और उनके रक्षक [राजकर्मचारी आदि]-की नियुक्ति के समान अन्नरूप निमित्तवाली लोक और लोकपालों के संघात की स्थिति कर नगर के स्वामी के समान विचार किया—‘कथं नु’ यानी किस प्रकारसे—इस प्रकार वितर्क करते हुए [उसने सोचा] यह जो आगे बतलाया जानेवाला कार्य (भूत) और करणों (इन्द्रियों) -के संघात का कार्य (व्यापार) है वह परार्थ (दूसरे के लिये) होने के कारण मेरे सिवा अर्थात् पुर के स्वामीरूप मेरे बिना कै से होगा? जिस प्रकार अपने स्वामी के लिये प्रयुक्त पुरवासी और बन्दीजन आदि की बलि (कर) एवं स्तुति आदि स्वामी के बिना अर्थात् स्वामी के अभाव में निरर्थक ही है उसी प्रकार [मेरे बिना भी] यह जो वाणी से बोलना आदि है अर्थात् केवल वाग्व्यापारादि है वह निरर्थक ही होगा यानी किसी प्रकार न हो सकेगा ।
अतः नगर के [अधिष्ठाता] राजा के समान इस देहरूप संघात के परम प्रभु और अधिष्ठाता मुझे भी इसके पापपुण्य के फल के साक्षी और भोक्तारूप से स्थित होना चाहिये । यदि इस देहेन्द्रियसंघात का कार्य परार्थ (दूसरे के लिये) है और वह पुरस्वामी के बिना पुर और पुरवासियों के कार्य के समान मुझ परार्थी अपने चेतन रक्षक के बिना हो सकता है तो मैं क्या रहा? अर्थात् किस स्वरूपवाला अथवा किसका स्वामी रहा?
जिस प्रकार राजा नगर में प्रवेशकर वहाँ के अधिकारी पुरुषों के कार्यअकार्यादि का निरीक्षण करता है उसी प्रकार यदि मैं भी इस भूत और इन्द्रियों के संघात में प्रवेश कर के वाणी आदि के उच्चारणादि फल को ग्रहण न करूँगा तो कोई भी मुझे ‘यह सत् है और ऐ से स्वरूपवाला है’ ऐसा अधिगम—विचार नहीं कर सकेगा । इसके विपरीत अवस्था में ही मैं इस प्रकार जाना जा सकता हूँ कि जिस प्रकार स्तम्भ और भित्ति आदि से मिलकर बने हुए मन्दिर आदि संघात अपने अवयवों के सहित किसी अन्य असंहत वस्तु के लिये होते हैं उसी प्रकार जिसके लिये इन संघातरूप वाणी आदि के उच्चारणादि व्यापार हैं और जो इन वाणी आदि के उच्चारणादि को ‘इदम्’ इस प्रकार जानता है वह मैं सत् और चेतनस्वरूप हूँ ।
इस प्रकार विचारकर [उसने सोचा] अतः मैं किस द्वार से प्रवेश करूँ? इस संघात में प्रवेश करने के दो मार्ग हैं—पदाग्र और मूर्धा । इनमें से मैं किस मार्ग से इस कार्य-करण के संघातरूप पुर में प्रवेश करूँ? ॥ ११ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स एवं लोकलोकपालसंघातस्थितिमन्ननिमित्तां कृत्वा पुरपौरतत्पालयितृस्थितिसमां स्वामीव ईक्षत—कथं नु केन प्रकारेणेति वितर्कयन्निदं मदृते मामन्तरेण पुरस्वामिनम्, यदिदं कार्यकारणसंघातकार्यं वक्ष्यमाणं कथं नु खलु मामन्तरेण स्यात्परार्थं सत् । यदि वाचाभिव्याहृतमित्यादि केवलमेव वाग्व्यवहरणादि तन्निरर्थकं न कथञ्चन भवेद्बलिस्तुत्यादिवत्; पौरवन्द्यादिभिः प्रयुज्यमानं स्वाम्यर्थं सत्तत्स्वामिनमन्तरेणासत्येव स्वामिनि तद्वत् ।
तस्मान्मया परेण स्वामिनाधिष्ठात्रा कृताकृतफलसाक्षिभूतेन भोक्त्रा भवितव्यं पुरस्येव राज्ञा । यदि नामैतत्संहतकार्यस्य परार्थत्वं परार्थिनं मां चेतनमन्तरेण भवेत्पुरपौरकार्यमिव तत्स्वामिनम्, अथ कोऽहं किं स्वरूपः कस्य वा स्वामी?
यद्यहं कार्यकारणसंघातमनुप्रविश्य वागाद्यभिव्याहृतादिफलं नोपलभेय राजेव पुरमाविश्याधिकृतपुरुषकृताकृतावेक्षणम्; न कश्चिन्मामयं सन्नेवं रूपश्चेत्यधिगच्छेद्धिचारयेत् । विपर्यये तु योऽयं वागाद्यभिव्याहृतादीदमिति वेद, स सन्वेदनरूपश्चेत्यधिगन्तव्योऽहं स्याम्; यदर्थमिदं संहतानां वागादीनामभिव्याहृतादि, यथा स्तम्भकुड्यादीनां प्रासादादिसंहतानां स्वावयवैरसंहतपरार्थत्वं तद्वदिति ।
एवमीक्षित्वातः कतरेण प्रपद्या इति । प्रपदं च मूर्धा चास्य संघातस्य प्रवेशमार्गौ । अनयोः कतरेण मार्गेणेदं कार्यकारणसंघातलक्षणं पुरं प्रपद्यै प्रपद्येयेति ॥ ११ ॥