सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम् ।
तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः, अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥
sa etameva sīmānaṃ vidāryaitayā dvārā prāpadyata .
saiṣā vidṛtirnāma dvāstadetannāndanam .
tasya traya āvasathāstrayaḥ svapnāḥ, ayamāvasatho’yamāvasatho’yamāvasatha iti .. 12 ..
वह सृष्टिकर्ता ईश्वर इस मूर्ध-सीमा को ही, जिसका केशों का विभाग ही अवसान है, विदीर्ण कर अर्थात् उसमें छिद्र कर उसी के द्वारा—उस मार्ग से ही इस लोक अर्थात् भूत और इन्द्रियों के संघात में प्रवेश कर गया । वही प्रसिद्ध द्वार है; क्योंकि सिर में तैल आदि धारण करते समय भीतर उसके रसादि का अनुभव होता है । विदीर्ण किया जाने के कारण वह द्वार ‘विदृति’ अर्थात् विदृति नाम से प्रसिद्ध है ।
इससे भिन्न जो श्रोत्रादि द्वार हैं वे भृत्यादिरूप साधारण मार्ग होने के कारण समृद्ध अर्थात् आनन्द के हेतु नहीं हैं । किन्तु यह मार्ग तो केवल परमेश्वर का ही है । अतः यह नान्दन (आनन्दप्रद) है । नन्दन को ही यहाँ नान्दन कहा है । ‘नान्दनम्’ इस पद [-के नकार-] में दीर्घ वैदिक प्रक्रिया के अनुसार है ।
तात्पर्य यह है कि इस मार्ग से जाकर पुरुष परब्रह्म में आनन्द प्राप्त करने लगता है ।
पुर में प्रविष्ट हुए राजा के समान इस प्रकार रचना कर के उसमें जीवरूप से प्रवेश करनेवाले उस ईश्वर के तीन आवसथ हैं—(१) जाग्रत्काल में इन्द्रियों का स्थान दक्षिण नेत्र; (२) स्वप्नकाल में मन के भीतर और (३) सुषुप्ति में हृदयाकाश के अन्दर अथवा आगे बतलाये जानेवाले पितृदेह, मातृगर्भाशय और अपना ही शरीर—ये ही तीन आवसथ हैं ।
तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति नामक तीन स्वप्न हैं । यदि कहो कि प्रबोधरूप होने के कारण जाग्रत् स्वप्न नहीं है, तो ऐसी बात नहीं है; वह भी स्वप्न ही है । किस प्रकार? क्योंकि उस समय परमार्थ आत्मस्वरूप के बोध का अभाव होता है और स्वप्न के समान असत् वस्तुएँ दिखलायी दिया करती हैं । [उन आवसथोंमें] यह दक्षिण नेत्र ही प्रथम है, मन का अन्तर्भाग द्वितीय है और हृदयाकाश तृतीय है ।
अयमावसथः [ऐसा जो तीन बार कहा गया है] यह पूर्वकथित का ही अनुकीर्तन है । उन आवसथों में क्रमशः आत्मभाव से रहनेवाला यह जीव दीर्घकालतक स्वाभाविक अविद्या से गाढ निद्रा में सोता रहता है और अनेकों शतसहस्र अनर्थों की प्राप्ति से होनेवाले दुःखरूप मुद्गरों के आघात के अनुभव से भी नहीं जगता ॥ १२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स स्रष्टेश्वर एतमेव मूर्धसीमानं केशविभागावसानं विदार्यच्छिद्रं कृत्वैतया द्वारा मार्गेणेमं लोकं कार्यकारणसंघातं प्रापद्यत प्रविवेश । सेयं हि प्रसिद्धा द्वाः मूर्ध्नि तैलादिधारणकाले अन्तस्तद्रसादिसंवेदनात् । सैषा विदृतिर्विदारितत्वाद्धिदृतिर्नाम प्रसिद्धा द्वाः ।
इतराणि तु श्रोत्रादिद्वाराणि भृत्यादिस्थानीयसाधारणमार्गत्वान्न समृद्धीनि नानन्दहेतूनि । इदं तु द्वारं परमेश्वरस्यैव केवलस्येति तदेतन्नान्दनं नन्दनमेव । नान्दनमिति दैर्घ्यं छान्दसम् । नन्दत्यनेन द्वारेण गत्वा परस्मिन्ब्रह्मणीति ।
तस्यैवं सृष्ट्वा प्रविष्टस्य जीवेनात्मना राज्ञ इव पुरं त्रय आवसथाः । जागरितकाल इन्द्रियस्थानं दक्षिणं चक्षुः, स्वप्नकालेऽन्तर्मनः, सुषुप्तिकाले हृदयाकाश इत्येतत् । वक्ष्यमाणा वा त्रय आवसथाः; पितृशरीरं मातृगर्भाशयः स्वं च शरीरमिति ।
त्रयः स्वप्ना जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्याः । ननु जागरितं प्रबोधरूपत्वान्न स्वप्नः; नैवम्, स्वप्न एव । कथम्? परमार्थस्वात्मप्रबोधाभावात्स्वप्नवदसद्वस्तुदर्शनाच्च । अयमेवावसथश्चक्षुर्दक्षिणं प्रथमः, मनोऽन्तरं द्वितीयः, हृदयाकाशस्तृतीयः ।
अयमावसथ इत्युक्तानुकीर्तनमेव । तेष्वह्ययमावसथेषु पर्यायेणात्मभावेन वर्तमानोऽविद्यया दीर्घकालं गाढप्रसुप्तः स्वाभाविक्त्या न प्रबुध्यतेऽनेकशतसहस्रानर्थसंनिपातजदुःखमुद्गराभिघातानुभवैरपि ॥ १२ ॥