अध्याय 1 खण्ड 3 - मन्त्र 13

स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति ।
स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् ।
इदमदर्शमिती ३ ॥ १३ ॥

sa jāto bhūtānyabhivyaikhyat kimihānyaṃ vāvadiṣaditi .
sa etameva puruṣaṃ brahma tatamamapaśyat .
idamadarśamitī 3 .. 13 ..


[इस प्रकार शरीर में प्रवेश कर के जीवरूपसे] उत्पन्न हुए उस परमेश्वरने भूतों को [तादात्म्यभावसे] ग्रहण किया । और [गुरुकृपा से बोध होनेपर] ‘यहाँ [मेरे सिवा] अन्य कौन है’ ऐसा कहा । और मैंने इ से (अपने आत्मस्वरूपको) देख लिया है इस प्रकार उसने इस पुरुष को ही पूर्णतम ब्रह्मरूप से देखा ॥ १३ ॥

उसने उत्पन्न होकर—जीवभाव से शरीर में प्रविष्ट होकर भूतों को व्याकृत किया [अर्थात् उन्हें तादात्म्यरूप से ग्रहण किया] । फिर किसी समय परम कारुणिक आचार्य के द्वारा अपने कर्णमूलमें—जिस का शब्द आत्मज्ञान का दृढ़ बोध करानेवाला है ऐसी—वेदान्तवाक्यरूप महाभेरी के बजाये जाने पर उसने, जिसका सृष्टि आदि के कर्तृत्वरूप से प्रकरण चला हुआ है उस पुरुष—[शरीररूप] पुर में शयन करनेवाले आत्मा को ततम—

इसमें एक तकार का लोप हुआ है । अतः तततम—व्याप्ततम अर्थात् आकाश के समान परिपूर्ण महान् ब्रह्मरूप से जाना—साक्षात्कार किया । किस प्रकार साक्षात्कार किया [सो बतलाते हैं—] ‘अहो! मैंने अपने आत्मा के स्वरूप को ही इस ब्रह्मरूप से देखा है’ इस प्रकार । यहाँ ‘इती’ पद में जो प्लुत उच्चारण है वह विचार प्रदर्शित करने के लिये है ॥ १३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें
स जातः शरीरे प्रविष्टो जीवात्मना भूतान्यभिव्यैख्यद्व्याकरोत् । स कदाचित्परमकारुणिकेनाचार्येणात्मज्ञानप्रबोधकृच्छब्दिकायां वेदान्तमहावाक्यभेर्यां तत्कर्णमूले ताड्यमानायामेतमेव सृष्ट्यादिकर्तृत्वेन प्रकृतं पुरुषं पुरि शयानमात्मानं ब्रह्म बृहत्तमं तकारेणैकेन लुप्तेन तततमं व्याप्ततमं परिपूर्णमाकाशवत्प्रत्यबुध्यतापश्यत् । कथम्? इदं ब्रह्म ममात्मनः स्वरूपमदर्शं दृष्टवानस्मि, अहो इति, विचारणार्था प्लुतिः पूर्वम् ॥ १३ ॥

‘इन्द्र’ शब्दकी व्युत्पत्ति

क्योंकि जो [जीवरूपसे] सब के भीतर रहनेवाला है उस ब्रह्म को ‘इदम् (यह)’ इस प्रकार साक्षात् अपरोक्षरूप से देखा था परोक्षरूप से नहीं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्मादिदमित्येव यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म सर्वान्तरमपश्यत् परोक्षेण—