इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयः खण्डः समाप्तः ॥ ३ ॥
उपनिषत्क्रमेण प्रथमः, आरण्यकक्रमेण चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।
तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण ।
परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥
tasmādidandro nāmedandro ha vai nāma .
tamidandraṃ santamindra ityācakṣate parokṣeṇa .
parokṣapriyā iva hi devāḥ parokṣapriyā iva hi devāḥ .. 14 ..
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तस्मादिदं पश्यतीतीदन्द्रो नाम परमात्मा । इदन्द्रो ह वै नाम प्रसिद्धो लोक ईश्वरः ।
तमेवमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इति परोक्षेण परोक्षाभिधानेनाचक्षते ब्रह्मविदः संव्यवहारार्थम्; पूज्यतमत्वात्प्रत्यक्षनामग्रहणभयात् । तथा हि परोक्षप्रियाः परोक्षनामग्रहणप्रिया इव एव हि यस्माद्देवाः; किमुत सर्वदेवानामपि देवो महेश्वरः । द्विर्वचनं प्रकृताध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १४ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
प्रथम खण्ड
प्रस्तावना
इस (पूर्वोक्त) चौथे अध्यायमें यह वाक्यार्थ विवक्षित है— जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाले असंसारी सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञने अपनेसे भिन्न किसी अन्य वस्तुको ग्रहण किये बिना ही इस सम्पूर्ण जगत्की आकाशादिक्रमसे रचना कर अपनेको स्वयं ही जाननेके लिये सम्पूर्ण प्राणादियुक्त शरीरमें स्वयं ही प्रवेश किया और प्रवेश करके ‘मैं यह ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार अपने यथार्थ स्वरूपका साक्षात् बोध प्राप्त किया । अतः समस्त शरीरमें एकमात्र वही आत्मा है, उससे भिन्न नहीं । [इसके सिवा] “[सम्पूर्ण भूतोंमें] जो सम आत्मा ब्रह्म है वह मैं हूँ— ऐसा जाने” “निश्चय पहले एक आत्मा ही था” तथा “[उसने] ब्रह्मको [आकाशके समान] अतिशय व्याप्त [जाना]” । ऐसा भी कहा है और [ऐसा ही] अन्य उपनिषदोंमें भी कहा है ।
पूर्व०—उस सर्वगत सर्वात्माके लिये तो बालका अग्रभाग भी अप्रविष्ट नहीं है; फिर वह चींटीके बिलप्रवेशके समान मूर्धसीमाको विदीर्णकर किस प्रकार मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट हुआ?
सिद्धान्ती—तुम्हारा यह प्रश्न तो अल्प है । अभी तो उपर्युक्त कथनमें बहुत कुछ पूछनेयोग्य बातें हैं । उसने इन्द्रियहीन होकर भी ईक्षण किया । किसी उपादानके बिना ही लोकोंकी रचना की । जलमेंसे पुरुष निकालकर उसे अवयवयोजनाद्वारा पुष्ट किया । अभिध्यानके द्वारा उसका मुख प्रकट हुआ तथा मुखादिसे अग्नि आदि लोकपाल प्रकट हुए । उनका क्षुधा-पिपासादिसे संयोग कराना, उनका आयतनके लिये प्रार्थना करना, उसके लिये गौ आदि दिखलाना, उन देवताओंका अपने-अपने अनुकूल आयतनोंमें प्रवेश करना, उत्पन्न हुए अन्नका भागना और उसे वाक् आदि इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेकी इच्छा करना—ये सब बातें भी सीमा विदीर्ण करने और शरीरमें प्रवेश करनेके समान ही [आश्चर्यजनक] हैं ।
पूर्व०—अच्छा तो, इन सभी बातोंको अनुपपन्न (असम्भव) मान लो ।
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुतिको यहाँ केवल आत्मावबोधमात्र कहना अभीष्ट होनेसे यह सब अर्थवाद है; अतः इसमें कोई दोष नहीं है अथवा मायावीके समान महामायावी सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् प्रभुने इस सम्पूर्ण जगत्की रचना की है, और इस रहस्यका सरलतासे ज्ञान प्राप्त करनेके लिये ही लौकिक रीतिसे यह आख्यायिका आदिकी रचना की गयी है—इस प्रकार भी यह पक्ष युक्तियुक्त जान पड़ता है; क्योंकि केवल लोकरचनाकी आख्यायिका आदिके परिज्ञानसे कुछ भी फल नहीं मिलता । परन्तु आत्माके एकत्व और यथार्थ स्वरूपके ज्ञानसे अमरत्वरूप फल [प्राप्त होता है—यह] सभी उपनिषदोंमें प्रसिद्ध है । तथा “सम्पूर्ण भूतोंमें समान भावसे स्थित परमेश्वरको” इत्यादि वाक्योंद्वारा गीता आदि स्मृतियोंमें भी [यही बात कही गयी है ।] ।
पूर्व०—आत्मा तो तीन हैं; उनमें एक तो सम्पूर्ण लोक और शास्त्रमें प्रसिद्ध कर्ता-भोक्ता संसारी जीव है । नगर और प्रासादादिके निर्माणके लिंगसे जिस प्रकार तत्सम्बन्धी कौशलके ज्ञानवाले उनके रचयिता तक्षा (कारीगर) आदिका ज्ञान होता है उसी प्रकार अनेक प्राणियोंके कर्मफलके उपभोगयोग्य अनेकों अधिष्ठानोंवाले लोक और देहकी रचनाके शास्त्रप्रदर्शित लिंगसे दूसरे चेतन आत्मा—जगत्कर्ता सर्वज्ञ ईश्वरका ज्ञान होता है । तथा तीसरा आत्मा “जहाँसे वाणी लौट आती है” एवं “यह नहीं, यह नहीं” इत्यादि शास्त्रसे प्रसिद्ध औपनिषद पुरुष है । इस प्रकार ये तीनों आत्मा एक-दूसरेसे विलक्षण हैं, अतः यह कैसे जाना जा सकता है कि आत्मा एक, अद्वितीय और असंसारी ही है?
सिद्धान्ती—इन तीनोंमें पहले जीवका ही ज्ञान कैसे होता है?
पूर्व०—इस प्रकार ज्ञान होता है कि ‘वह श्रवण करनेवाला, मनन करनेवाला, द्रष्टा, आज्ञा करनेवाला, शब्द उच्चारण करनेवाला, विज्ञाता और प्रज्ञाता[ ३ ] है ।’
सिद्धान्ती—परन्तु जिसका श्रवणादिके कर्तारूपसे ज्ञान होता है उसे ‘अमत और मनन करनेवाला, अविज्ञात और विशेषरूपसे जाननेवाला’ इस प्रकार कहना तथा “मतिके मनन करनेवालेका मनन न करो, विज्ञातिके विज्ञाताको न जानो” इत्यादि श्रुतिवचन भी विरुद्ध होगा ।
पूर्व०—यदि उसे सुखादिके समान प्रत्यक्षरूपसे जाना जाय तो अवश्य विरुद्ध होगा । किन्तु “मतिके मनन करनेवालेका मनन न करो” इत्यादि वाक्यसे उसके प्रत्यक्षज्ञानका निवारण किया गया है । उसका ज्ञान तो श्रवणादि लिंगसे होता है; फिर इसमें विरोध कहाँ है?
सिद्धान्ती—श्रवणादि लिंगसे भी आत्माका ज्ञान किस प्रकार हो सकता है? क्योंकि जब और जिस समय आत्मा सुननेयोग्य शब्दको सुनता है उस समय श्रवणक्रियाके साथ ही वर्तमान रहनेके कारण उसके लिये अपनेमें अथवा अन्यत्र मनन या विज्ञानरूप क्रियाएँ सम्भव नहीं हैं । [इस प्रकार विजातीय क्रियाओंकी समकालीनताका निषेध करके अब सजातीय क्रियाओंका निषेध करते हैं—] इसी प्रकार अन्यत्र मनन आदि क्रियाओंमें भी समझना चाहिये । श्रवणादि क्रियाएँ भी अपने विषयोंमें ही प्रवृत्त हो सकती हैं [आश्रयमें नहीं] । मनन करनेवालेकी मननक्रिया मन्तव्यसे भिन्न स्थानमें सम्भव नहीं है ।
पूर्व०—मनसे तो सभीका मनन किया जाता है ।
सिद्धान्ती—यह ठीक है; परन्तु जो कुछ मनन किया जाता है वह सब मननकर्ताके बिना नहीं किया जा सकता ।
पूर्व०—यदि ऐसा हो भी तो इससे क्या होगा?
सिद्धान्ती—इससे यहाँ यह होगा कि जो इस सबका मनन करनेवाला है वह मनन करनेवाला ही रहेगा, मन्तव्य नहीं होगा । तथा उस मनन करनेवालेका कोई दूसरा मननकर्ता भी नहीं है । यदि उसे आत्माद्वारा ही मन्तव्य माना जाय तो जिस आत्मासे आत्मा मनन किया जाता है और जिस आत्माका मनन किया जाता है उनके दो होनेका प्रसंग उपस्थित हो जायगा अथवा बाँस आदिके समान एक ही आत्मा मन्ता और मन्तव्यरूपसे दो भागोंमें विभक्त माना जायगा । किन्तु उपर्युक्त दोनों प्रकारसे अनुपपत्ति ही है । जैसे कि समानरूप होनेके कारण दो दीपकोंका परस्पर प्रकाश्य-प्रकाशकत्व नहीं बन सकता, उसी प्रकार [यहाँ समझना चाहिये] ।
इसके सिवा मन्ताको अपना मनन करनेके लिये मन्तव्य पदार्थोंका मनन करनेके व्यापारसे रहित कोई काल भी नहीं है । जिस समय भी किसी लिंगके द्वारा मन्ता अपना मनन करता है उस समय भी पहलेहीके समान लिंगसे मन्तव्य आत्मा और जो कोई उसका मनन करनेवाला है वे दो सिद्ध होते हैं; अथवा एक ही दो भागोंमें विभक्त है— इस प्रकार पूर्वोक्त दोष उपस्थित हो जाता है । और यदि वह न प्रत्यक्षसे जाना जाता है और न अनुमानसे तो ऐसा क्यों कहते हैं कि “वह मेरा आत्मा है— ऐसा जाने” और क्यों उसे श्रोता-मन्ता इत्यादि बतलाते हैं?
पूर्व०—आत्मा तो श्रोतृत्वादि धर्मवाला है और आत्माके अश्रोतृत्व आदि धर्म भी [श्रुतिमें] प्रसिद्ध हैं । फिर इसमें तुम्हें विषमता क्या दिखलायी देती है?
सिद्धान्ती—यद्यपि तुझे कोई विषमता ज्ञात नहीं होती, तथापि मुझे तो होती ही है । किस प्रकार कि जिस समय यह श्रोता होता है उस समय मन्ता नहीं होता और जब मन्ता होता है तब श्रोता नहीं होता । ऐसा होनेके कारण वह एक पक्षमें श्रोता और मन्ता है तो दूसरे पक्षमें न श्रोता है और न मन्ता ही है । ऐसा ही अन्यत्र (विज्ञाता आदिके सम्बन्धमें) भी समझना चाहिये ।
जब कि ऐसी बात है तब आत्मा श्रोतृत्वादि धर्मवाला है अथवा अश्रोतृत्वादि धर्मवाला? इस प्रकार संशयस्थान उपस्थित होनेपर तुझे विषमता क्यों नहीं दिखायी देती? जिस समय देवदत्त चलता है उस समय वह चलनेवाला ही होता है ठहरनेवाला नहीं होता, तथा जिस समय वह ठहरता है उस समय वह ठहरनेवाला ही होता है, चलनेवाला नहीं होता । ऐसी अवस्थामें इसका गन्तृत्व और स्थातृत्व पाक्षिक ही होता है, नित्यगन्तृत्व अथवा नित्यस्थातृत्व नहीं होता । इसी प्रकार [आत्माका श्रोतृत्व आदि भी पाक्षिक ही सिद्ध होगा, नित्य नहीं] ।
काणाद आदि अन्य मतावलम्बी भी इस विषयमें ऐसा ही समझते हैं; क्योंकि इस विषयमें उनका कथन है कि पक्षमें प्राप्त होनेवाले श्रोतृत्वादिके कारण ही आत्मा श्रोता, मन्ता इत्यादि कहा जाता है । वे ज्ञानका संयोगजत्व (इन्द्रिय और मनके संयोगसे उत्पन्न होना) और अयौगपद्य (एक साथ न होना) प्रतिपादन करते हैं । और मनको एक साथ ज्ञान उत्पन्न न होनेमें वे ‘मैं अन्यमनस्क था, इसलिये न देख सका’ इत्यादि लिंग प्रदर्शित करते हैं और यह युक्तिसंगत भी है ।
पूर्व०—ऐसा सिद्धान्त भले ही रहे; किन्तु यदि ऐसा हो भी तो तुम्हारी क्या हानि है?
सिद्धान्ती—यदि तुम्हें अभिमत हो तो तुम्हारे लिये ऐसा भले ही हो; परन्तु यह श्रुतिका तात्पर्य तो हो नहीं सकता ।
पूर्व०—क्या श्रोता, मन्ता इत्यादि श्रुतिका अर्थ नहीं है?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि [श्रुतिमें तो] ‘न श्रोता है न मन्ता है’ इत्यादि भी कहा है ।
पूर्व०—परन्तु इस विरोधको तो तुमने पाक्षिक बतलाकर खण्डित कर दिया है ।
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि आत्माका श्रोतृत्व आदि तो नित्य ही माना गया है, जैसा कि “श्रोताकी श्रुतिका लोप कभी नहीं होता” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
पूर्व०—ऐसी दशामें तो आत्माका नित्य श्रोतृत्वादि माननेपर प्रत्यक्षविरुद्ध अनेक ज्ञानोंका एक साथ उत्पन्न होना और आत्मामें अज्ञानका अभाव ये दो बातें माननी पड़ेंगी । किन्तु यह किसीको अभीष्ट नहीं है ।
सिद्धान्ती—इन दोनों दोषोंकी सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि श्रुतिके कथनानुसार आत्मा श्रुति आदिके श्रोतृत्वादि धर्मवाला है जिस प्रकार अग्निका प्रज्वलित होना, तृणादिके संयोगसे होनेके कारण, अनित्य है; उसी प्रकार संयोग-वियोगधर्मी, मूर्त एवं अनित्य चक्षु आदिके धर्म दृष्टि आदि अनित्य ही हैं । किन्तु जो नित्य, अमूर्त और संयोग-वियोगधर्मसे रहित है उस (आत्मा)-का संयोगजनित दृष्टि आदि अनित्य धर्मोंसे युक्त होना सम्भव नहीं है । ऐसी ही “द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं होता” इत्यादि श्रुति भी है । इस प्रकार दो दृष्टि सिद्ध होती हैं—(१) नेत्रकी अनित्य दृष्टि और (२) आत्माकी नित्य दृष्टि । इसी प्रकार दो श्रुति हैं— श्रोत्राकी अनित्य श्रुति और आत्माकी नित्य श्रुति । तथा इसी प्रकार बाह्य और अबाह्यरूप दो मति और दो विज्ञाति हैं । ऐसी अवस्थामें ही “दृष्टिका द्रष्टा है, श्रुतिका श्रोता है” इत्यादि श्रुति सार्थक हो सकती है ।
लोकमें भी तिमिर रोगकी उत्पत्ति और विनाशसे ‘दृष्टि नष्ट हो गयी, दृष्टि उत्पन्न हो गयी’ इस प्रकार नेत्रकी दृष्टिका अनित्यत्व प्रसिद्ध ही है । इसी प्रकार श्रुति- मति इत्यादिका [अनित्यत्व माना गया है; ] और आत्माकी दृष्टि आदिका नित्यत्व तो लोकमें प्रसिद्ध ही है । जिसके नेत्र निकाल लिये गये हैं वह पुरुष भी ऐसा कहता ही है कि ‘आज स्वप्नमें मैंने अपने भाईको देखा था ।’ तथा जिसका बहरापन सबको ज्ञात है वह भी ‘मैंने स्वप्नमें मन्त्र सुना’ इत्यादि कहता ही है । यदि आत्माकी नित्य दृष्टि नेत्रेन्द्रियके संयोगसे ही उत्पन्न होनेवाली हो तो वह उसका नाश होनेपर नष्ट हो जाय । उस अवस्थामें जिसके नेत्र निकाल लिये गये हैं वह पुरुष स्वप्नमें नीला-पीला आदि नहीं देख सकेगा और तब “द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता” इत्यादि श्रुति और “वह नेत्र है, जिसके द्वारा पुरुष स्वप्न में देखता है” इत्यादि श्रुति भी निरर्थक हो जायगी ।
आत्मा की नित्य दृष्टि बाह्य अनित्य दृष्टि को ग्रहण करनेवाली है । बाह्य दृष्टि उत्पत्ति-विनाशादि अनित्य धर्मोंवाली है; अतः लोगों को जो उसे ग्रहण करनेवाली आत्मदृष्टि का उसी के समान भासित होना और अनित्य होना आदि प्रतीत होता है वह भ्रान्ति के कारण है—ऐसा मानना ठीक ही है । जिस प्रकार भ्रमण आदि धर्मवाली अलातचक्र आदि वस्तुओं से सम्बन्धित दृष्टि भी भ्रमती-सी जान पड़ती है, उसी प्रकार [इसे समझना चाहिये] । ऐसा ही “ध्यायतीव लेलायतीव” आदि श्रुति भी कहती है । अतः नित्य होने के कारण आत्मदृष्टि का यौगपद्य (अनेक दृष्टियों का एक साथ होना) अथवा अयौगपद्य नहीं है ।
बाह्य अनित्य दृष्टिरूप उपाधि के कारण लोक को और तार्किक पुरुषों को वैदिक सम्प्रदाय से रहित होने के कारण ऐसी भ्रान्ति होना उचित ही है कि आत्मा की दृष्टि अनित्य है । जीव, ईश्वर और परमात्मा के भेद की कल्पना भी इसी निमित्त से है । इसी प्रकार अस्ति (है) नास्ति (नहीं है) आदि जितने भी वाणी और मन के भेद हैं वे सब जहाँ एक हो जाते हैं उसे विषय करनेवाली नित्य निर्विशेष दृष्टि के सम्पूर्ण वाक्प्रतीतियों के अविषय स्वरूप में जो है-नहीं है, एकअनेक, सगुण-निर्गुण, जानता है, नहीं जानता, सक्रिय-निष्क्रिय, सफल-निष्फल, सबीज-निर्बीज, सुख-दुःख, मध्यअमध्य, शून्य-अशून्य अथवा पर-अहं एवं अन्य की कल्पना करना चाहता है वह निश्चय ही आकाश को भी चमड़े के समान लपेटना चाहता है और अपने पैरों से उसपर सीढ़ियों के समान आरूढ़ होने को उद्यत है । वह मानो जल और आकाश में मछली तथा पक्षियों के चरणचिह्न देखने को उत्सुक है; जैसा कि “नेति नेति” “यतो वाचो निवर्तन्ते” इत्यादि श्रुतियों और “को अद्धा वेद” इत्यादि मन्त्रवर्ण से सिद्ध होता है ।
पूर्व०—तो फिर उसे ‘वह मेरा आत्मा है’ इस प्रकार कैसे जाना जाता है? बतलाओ उसे मैं किस प्रकार से ‘वह मेरा आत्मा है’ इस प्रकार जानूँगा?
सिद्धान्ती—इस विषय में एक आख्यायिका कहते हैं, किसी मूढ़ मनुष्य से किसीने उससे कोई अपराध बन जाने पर कहा—‘तुझे धिक्कार है, तू मनुष्य नहीं है ।’
उसने मूढ़तावश अपना मनुष्यत्व निश्चित कराने के लिये किसी के पास जाकर कहा—‘आप बतलाइये, मैं कौन हूँ? ’ वह उसकी मूर्खता समझकर उससे बोला—‘धीरेधीरे बतलाऊँगा ।’ और फिर स्थावरादि में उसके आत्मत्व का निषेध बतलाकर ‘तू अमनुष्य नहीं है, ’ ऐसा कहकर चुप हो गया । तब उस मूर्खने उससे कहा—‘आप मुझे समझाने के लिये प्रवृत्त होकर अब चुप हो गये, समझाते क्यों नहीं हैं? ’ उसी के समान आपके ये वचन हैं । जो पुरुष ‘तू अमनुष्य नहीं है’ ऐसा कहने पर अपना मनुष्यत्व नहीं समझता वह ‘तू मनुष्य है’ ऐसा कहने पर भी अपना मनुष्यत्व कैसे समझ सकेगा?
अतः जैसा शास्त्र का उपदेश है उसके अनुसार ही आत्मसाक्षात्कार की विधि है, उससे भिन्न नहीं । अग्नि से दग्ध होनेवाले तृण आदि किसी अन्य वस्तु से नहीं जलाये जा सकते । अतएव शास्त्र आत्मस्वरूप का बोध कराने के लिये प्रवृत्त होकर अमनुष्यत्व के प्रतिषेध के समान “नेति नेति” ऐसा कहकर चुप हो गया है । इसी तरह “अन्तर्बाह्यभाव से रहित” “यह आत्मा सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है” इत्यादि भी शास्त्र का उपदेश है ।
तथा “वह तू है” “जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो जाता है वहाँ किससे किसे देखे? ” इत्यादि ऐसे ही और भी वाक्य यही बतलाते हैं ।
जबतक यह जीव उपर्युक्त आत्मा को ‘यह ऐसा है’ इस प्रकार नहीं जानता तबतक यह बाह्य अनित्य दृष्टिरूप उपाधि को आत्मभाव से प्राप्त होकर अविद्यावश उपाधि के धर्मों को आत्मा के धर्म मानता हुआ ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त देवता, पशु-पक्षी और मनुष्यों की योनियों में पुनः-पुनः चक्कर लगाता हुआ अविद्या, कामना और कर्म के अधीन हो [जन्ममरणरूप] संसार को प्राप्त होता रहता है । वह इस प्रकार संसार को प्राप्त होता हुआ प्राप्त हुए देह और इन्द्रिय के संघात को त्याग देता है और एक को त्यागकर दूसरे को ग्रहण कर लेता है । वह इसी प्रकार नदी के स्रोत के समान जन्म-मरण की परम्परा का विच्छेद न होते हुए किन अवस्थाओं में रहता है, इसी बात को [मनुष्यों के मन में] वैराग्य उत्पन्न कराने के लिये दिखलाती हुई श्रुति कहती है—
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अस्मिंश्चतुर्थेऽध्याय एष अतीताध्याय- वाक्यार्थः—जगद्विषयावलोकनम् दुत्पत्तिस्थितिप्रलयकृदसंसारी सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्ववित्सर्वमिदं जगत्स्वतोऽन्यद्वस्त्वन्तरमनुपादायैव आकाशादिक्रमेण सृष्ट्वा स्वात्मप्रबोधनार्थं सर्वाणि च प्राणादिमच्छरीराणि स्वयं प्रविवेश । प्रविश्य च स्वमात्मानं यथाभूतमिदं ब्रह्मास्मीति साक्षात्प्रत्यबुध्यत । तस्मात्स एव सर्वशरीरेष्वेक एवात्मा नान्य इति । अन्योऽपि “सम आत्मा ब्रह्मास्मीत्येवं विद्यात्” इति । “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” (१ । १ । १) इति “ब्रह्म ततमम्” (१ । ३ । १३) इति चोक्तम् । अन्यत्र च ।
सर्वगतस्य सर्वात्मनो प्रवेशश्रुति- बालाग्रमात्रमप्यप्रविष्टं विचारः नास्तीति कथं सीमानं विदार्य प्रापद्यत पिपीलिकेव सुषिरम् ।
नन्वत्यल्पमिदं चोद्यं बहु चात्र चोदयितव्यम् । अकरणः सन्नीक्षत । अनुपादाय किञ्चिल्लोकानसृजत । अद्भ्यः पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् । तस्याभिध्यानान्मुखादि निर्भिन्नं मुखादिभ्यश्चाग्न्यादयो लोक- पालास्तेषां चाशनायापिपासादि- संयोजनं तदायतनप्रार्थनं तदर्थं गवादिप्रदर्शनं तेषां यथायतन- प्रवेशनं सृष्टस्यान्नस्य पलायनं वागादिभिस्तज्जिघृक्षा; एतत्सर्वं सीमाविदारणप्रवेशसममेव ।
अस्तु तर्हि सर्वमेवेद- मनुपपन्नम् ।
न; अत्रात्मावबोध- मात्रस्य विवक्षितत्वात्सर्वो- ऽयमर्थवाद इत्यदोषः । मायाविवद्वा महामायावी देवः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः सर्वमेतच्चकार । सुखावबोधनप्रतिपत्त्यर्थं लोक- वदाख्यायिकादिप्रपञ्च इति युक्ततरः पक्षः । न हि सृष्ट्याख्यायिकादि- परिज्ञानात्किञ्चित्फलमिष्यते । ऐकात्म्य- स्वरूपपरिज्ञानात्तु अमृतत्वं फलं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धम् । स्मृतिषु च गीताद्यासु “समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्” (गीता १३ । २७) इत्यादिना ।
ननु त्रय आत्मानः । आत्मैकत्वे भोक्ता कर्ता विचारः संसारी जीव एकः सर्वलोकशास्त्रप्रसिद्धः । अनेकप्राणिकर्मफलोपभोगयोग्याने- काधिष्ठानवल्लोकदेहनिर्माणे लिङ्गेन यथाशास्त्रप्रदर्शितेन पुरप्रासादादिनिर्माणलिङ्गेन तद्विषय- कौशलज्ञानवांस्तत्कर्ता तक्षादिरिवेश्वरः सर्वज्ञो जगतः कर्ता द्वितीयश्चेतन आत्मा अवगम्यते । “यतो वाचो निवर्तन्ते” (तै० उ० २ । ४ । १) “नेति नेति” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्यादिशास्त्रप्रसिद्ध औपनिषदः पुरुषस्तृतीयः । एवमेते त्रय आत्मानोऽन्योन्यविलक्षणाः । तत्र कथमेक एव आत्मा अद्वितीयः असंसारीति ज्ञातुं शक्यते?
तत्र जीव एव तावत्कथं ज्ञायते?
नन्वेवं ज्ञायते श्रोता मन्ता द्रष्टा आदेष्टा आघोष्टा विज्ञाता प्रज्ञातेति ।
ननु विप्रतिषिद्धं ज्ञायते यः श्रवणादिकर्तृत्वे नामतो मन्ताविज्ञातो विज्ञातेति च । तथा “न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः” (बृ० उ० ३ । ४ । २) इत्यादि च ।
सत्यं विप्रतिषिद्धम्, यदि प्रत्यक्षेण ज्ञायेत सुखादिवत् । प्रत्यक्षज्ञानं च निवार्यते “न मतेर्मन्तारं मन्वीथाः” (बृ० उ० ३ । ४ । २) इत्यादिना । ज्ञायते तु श्रवणादिलिङ्गेन; तत्र कुतो विप्रतिषेधः ।
ननु श्रवणादिलिङ्गेनापि कथं ज्ञायते? यावता यदा शृणोत्यात्मा श्रोतव्यं शब्दम्, तदा तस्य श्रवणक्रिययैव वर्तमानत्वा- न्मननविज्ञानक्रिये न सम्भवतः, आत्मनि परत्र वा । तथान्यत्रापि मननादिक्रियासु । श्रवणादिक्रियाश्च स्वविषयेष्वेव । न हि मन्तव्यादन्यत्र मन्तुर्मननक्रिया सम्भवति ।
ननु मनसा सर्वमेव मन्तव्यम् ।
सत्यमेवं तथापि सर्वमपि मन्तव्यं मन्तारमन्तरेण न मन्तुं शक्यम् ।
यद्येवं किं स्यात्?
इदमत्र स्यात्; सर्वस्य योऽयं मन्ता स मन्तैवेति न स मन्तव्यः स्यात् । न च द्वितीयो मन्तुर्मन्तास्ति । यदा स आत्मनैव मन्तव्यस्तदा येन च मन्तव्यः, आत्मा आत्मना यश्च मन्तव्य आत्मा तौ द्वौ प्रसज्येयाताम् । एक एवात्मा द्विधा मन्तृमन्तव्यत्वेन द्विशकलीभवेद्वंशादिवत् । उभय- थाप्यनुपपत्तिरेव । यथा प्रदीपयोः प्रकाश्यप्रकाशकत्वानुपपत्तिः समत्वात्तद्वत् ।
न च मन्तुर्मन्तव्ये मनन- व्यापारशून्यः कालोऽस्त्यात्म- मननाय । यदापि लिङ्गेनात्मानं मनुते मन्ता; तदापि पूर्ववदेव लिङ्गेन मन्तव्य आत्मा यश्च तस्य मन्ता तौ द्वौ प्रसज्येयाताम् एक एव वा द्विधेतिपूर्वोक्तदोषः । न प्रत्यक्षेण नाप्यनुमानेन ज्ञायते चेत् कथमुच्यते “स म आत्मेति विद्यात्” (कौषी० ३ । ९) इति? कथं वा श्रोता मन्तेत्यादि
ननु श्रोतृत्वादिधर्मवानात्मा, अश्रोतृत्वादि च प्रसिद्धमात्मनः । किमत्र विषमं पश्यसि?
यद्यपि तव न विषमं तथापि मम तु विषमं प्रतिभाति । कथम्? यदासौ श्रोता तदा न मन्ता यदा मन्ता तदा न श्रोता । तत्रैवं सति पक्षे श्रोता मन्ता पक्षे न श्रोता नापि मन्ता । तथान्यत्रापि च ।
यदैवं तदा श्रोतृत्वादिधर्मवा- नात्मा अश्रोतृत्वादिधर्मवान् वेति संशयस्थाने कथं तव न वैषम्यम् । यदा देवदत्तो गच्छति तदा न स्थाता गन्तैव । यदा तिष्ठति तदा न गन्ता स्थातैव ।
तदा अस्य पक्ष एव गन्तृत्वं स्थातृत्वं च । न नित्यं गन्तृत्वं स्थातृत्वं वा । तद्वत् ।
तथैवात्र काणादादयः पश्यन्ति । पक्षप्राप्तेनैव श्रोतृत्वादिना आत्मोच्यते श्रोता मन्तेत्यादि- वचनात् । संयोगजत्वमयौगपद्यं च ज्ञानस्य ह्याचक्षते । दर्शयन्ति चान्यत्रमना अभूवं नादर्श- मित्यादि युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गमिति च न्याय्यम् ।
भवत्वेवम्; किं तव नष्टं यद्येवं स्यात्?
अस्त्वेवं तवेष्टं चेत् । श्रुत्यर्थस्तु न सम्भवति ।
किं न श्रोता मन्तेत्यादि- श्रुत्यर्थः?
न; न श्रोता न मन्तेत्यादिवचनात् ।
ननु पाक्षिकत्वेन प्रत्युक्तं त्वया ।
न; नित्यमेव श्रोतृत्वाद्यभ्युप- गमात् । “न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४ । ३ । २७) इत्यादिश्रुतेः ।
एवं तर्हि नित्यमेव श्रोतृत्वाद्यभ्युपगमे प्रत्यक्षविरुद्धा युगपज्ज्ञानोत्पत्तिरज्ञानाभावश्चात्मनः कल्पितः स्यात् । तच्चानिष्टमिति ।
नोभयदोषोपपत्तिः । आत्मनः श्रुत्यादिश्रोतृत्वादिधर्मवत्त्वश्रुतेः । अनित्यानां मूर्तानां च चक्षुरादीनां दृष्ट्याद्यनित्यमेव संयोगवियोगधर्मिणाम्, यथाग्नेर्ज्वलनं तृणादिसंयोगजत्वात्तद्वत् । न तु नित्यस्यामूर्तस्यासंयोगवियोग- धर्मिणः संयोगजदृष्ट्या- द्यनित्यधर्मवत्त्वं सम्भवति । तथा च श्रुतिः “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४ । ३ । २३) इत्याद्या । एवं तर्हि द्वे दृष्टी चक्षुषोऽनित्या दृष्टिर्नित्या चात्मनः । तथा च द्वे श्रुती श्रोत्रस्यानित्या नित्या चात्मस्वरूपस्य । तथा द्वे मती विज्ञाती बाह्याबाह्ये एवं ह्येव । तथा चेयं श्रुतिरुपपन्ना भवति “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता” इत्याद्या ।
लोकेऽपि प्रसिद्धं चक्षुष- स्तिमिरोगमापाययोर्नष्टा दृष्टिर्जाता दृष्टिरिति चक्षुर्दृष्टेरनित्यत्वम्; तथा च श्रुतिमत्यादीनामात्म- दृष्ट्यादीनां च नित्यत्वं प्रसिद्धमेव लोके । वदति हि उद्धृतचक्षुः स्वप्नेऽद्य मया भ्राता दृष्ट इति । तथावगतबाधिर्यः स्वप्ने श्रुतो मन्त्रोऽद्येत्यादि । यदि चक्षुःसंयोगजैवात्मनो नित्या दृष्टिस्तन्नाशे नश्येत् । तदोद्धृतचक्षुः स्वप्ने नीलपीतादि न पश्येत् ।
“न हि द्रष्टुर्दृष्टे: ” (बृ० उ० ४ । ३ । २३) इत्याद्या च श्रुतिरनुपपन्ना स्यात् । “तच्चक्षुः पुरुषो येन स्वप्ने पश्यति” इत्याद्या च श्रुतिः ।
नित्या आत्मनो दृष्टिर्बाह्यानित्यदृष्टेर्ग्राहिका । बाह्यदृष्टेश्चोपजनापायाद्यनित्यधर्मवत्त्वात्तद्ग्राहिकाया आत्मदृष्टेस्तद्वदवभासत्वमनित्यत्वादि भ्रान्तिनिमित्तं लोकस्येति युक्तम् । यथा भ्रमणादिधर्मवदलातादिवस्तुविषयदृष्टिरपि भ्रमतीव तद्वत् । तथा च श्रुतिः “ध्यायतीव लेलायतीव” (बृ० उ० ४ । ३ । ७) इति । तस्मादात्मदृष्टेर्नित्यत्वान्न यौगपद्यमयौगपद्यं वास्ति ।
बाह्यानित्यदृष्ट्युपाधिवशात्तु लोकस्य तार्किकाणां चागमसंप्रदायवर्जितत्वाद् अनित्या आत्मनो दृष्टिरिति भ्रान्तिरुपपन्नैव । जीवेश्वरपरमात्मभेदकल्पना चैतन्निमित्तैव । तथा च अस्ति नास्तीत्याद्याश्च यावन्तो वाङ् मनसयोर्भेदा यत्रैकं भवन्ति, तद्विषयाया नित्याया दृष्टेर्निर्विशेषायाः—अस्ति नास्ति, एकं नाना, गुणवदगुणम्, जानाति न जानाति, क्रियावदक्रियम्, फलवदफलम्, सबीजं निर्बीजम्, सुखं दुःखम्, मध्यममध्यम्, शून्यमशून्यम्, परोऽहमन्य इति वा सर्ववाक्प्रत्ययागोचरे स्वरूपे यो विकल्पयितुमिच्छति; स नूनं खमपि चर्मवद्वेष्टयितुमिच्छति, सोपानमिव च पद्भ्यामारोढुम्, जले खे च मीनानां वयसां च पदं दिदृक्षते । “नेति नेति” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) “यतो वाचो निवर्तन्ते” (तै० उ० २ । ४ । १) इत्यादिश्रुतिभ्यः । “को अद्धा वेद” (ऋ० सं० ३ । ५४ । ५) इत्यादिमन्त्रवर्णात् ।
कथं तर्हि तस्य स म आत्मेति वेदनम् । ब्रूहि केन प्रकारेण तमहं स म आत्मेति विद्याम् ।
अत्राख्यायिकामाचक्षते—
कश्चित्किल मनुष्यो मुग्धः कैश्चिदुक्तः कस्मिंश्चिदपराधे सति धिक्त्वां नासि मनुष्य इति ।
स मुग्धतया आत्मनो मनुष्यत्वं प्रत्यायितुं कंचिदुपेत्याह—ब्रवीतु भवान्कोऽहमस्मीति । स तस्य मुग्धतां ज्ञात्वाह—क्रमेण बोधयिष्यामीति । स्थावराद्यात्मभावमपोह्य न त्वममनुष्य इत्युक्त्वोपरराम । स तं मुग्धः प्रत्याह—भवान्मां बोधयितुं प्रवृत्तस्तूष्णीं बभूव किं न बोधयतीति? तादृगेव तद्भवतो वचनम् । नास्यमनुष्य इत्युक्तेऽपि मनुष्यत्वमात्मनो न प्रतिपद्यते यः स कथं मनुष्योऽसीत्युक्तोऽपि मनुष्यत्वमात्मनः प्रतिपद्येत?
तस्माद्यथाशास्त्रोपदेश एवात्मावबोधविधिर्नान्यः । न ह्यग्नेर्दाह्यं तृणाद्यन्येन केनचिद्दग्धुं शक्यम् । अत एव शास्त्रमात्मस्वरूपं बोधयितुं प्रवृत्तं सदमनुष्यत्वप्रतिषेधेनेव “नेति नेति” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) इत्युक्त्वोपरराम । तथा “अनन्तरमबाह्यम्” (बृ० उ० २ । ५ । १९, ३ । ८ । ८) “अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः” (बृ० उ० २ । ५ । १९) इत्यनुशासनम् ।
“तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८—१६) “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्” (बृ० उ० २ । ४ । १४, ४ । ५ । १५) इत्येवमाद्यपि च ।
यावदयमेवं यथोक्तमिममात्मानं न वेत्ति तावदयं बाह्यानित्यदृष्टिलक्षणमुपाधिमात्मत्वेनोपेत्य अविद्यया उपाधिधर्मानात्मनो मन्यमानो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु देवतिर्यङ्नरस्थानेषु पुनः पुनरावर्तमानोऽविद्याकामकर्मवशात्संसरति । स एवं संसरनुपात्तदेहेन्द्रियसंघातं त्यजति । त्यक्त्वान्यमुपादत्ते । पुनः पुनरेवमेव नदीस्रोतोवज्जन्ममरणप्रबन्धाविच्छेदेन वर्तमानः काभिरवस्थाभिर्वर्तत इत्येतमर्थं दर्शयन्त्याह श्रुतिर्वैराग्यहेतोः—