अध्याय 1 खण्ड 3 - मन्त्र 2

सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत ।
या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २ ॥

so’po’bhyatapattābhyo’bhitaptābhyo mūrtirajāyata .
yā vai sā mūrtirajāyatānnaṃ vai tat .. 2 ..


उसने आपों (जलों)-को लक्ष्य करके तप किया । उन अभितप्त आपों से एक मूर्ति उत्पन्न हुई, यह जो मूर्ति उत्पन्न हुई वही अन्न है ॥ २ ॥
अन्न रचने की इच्छावाले उस ईश्वर ने उन पूर्वोक्त जलों को ही उद्देश्य करके तप किया । उन उपादानभूत अभितप्त जलों से ही धारण करने में समर्थ चराचरभूत घनरूप मूर्ति उत्पन्न हुई । यह जो मूर्ति उत्पन्न हुई वह मूर्तिरूप अन्न ही है ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स ईश्वरोऽन्नं सिसृक्षुस्ता एव पूर्वोक्ता अप उद्दिश्याभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्य उपादानभूताभ्यो मूर्तिर्धनरूपं धारणसमर्थं चराचरलक्षणमजायतोत्पन्नम् । अन्नं वै तन्मूर्तिरूपं या वै सा मूर्तिरजायत ॥ २ ॥