अध्याय 1 खण्ड 3 - मन्त्र 5

तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५ ॥

taccakṣuṣājighṛkṣattannāśaknoccakṣuṣā grahītuṃ sa yaddhainaccakṣuṣāgrahaiṣyad dṛṣṭvā haivānnamatrapsyat .. 5 ..


उसने इसे नेत्र से ग्रहण करना चाहा; परन्तु नेत्र से ग्रहण करने में समर्थ न हुआ । यदि वह इसे नेत्र से ग्रहण कर लेता तो [इस समय भी पुरुष] अन्न को देखकर ही तृप्त हो जाया करता ॥ ५ ॥