अध्याय 1 खण्ड 3 - मन्त्र 6

तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥

tacchrotreṇājighṛkṣattannāśaknocchrotreṇa grahītuṃ sa yaddhainacchrotreṇāgrahaiṣyacchrutvā haivānnamatrapsyat .. 6 ..


उसने इसे श्रोत्र से ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह श्रोत्र से ग्रहण न कर सका । यदि वह इसे श्रोत्र से ग्रहण कर लेता तो [इस समय भी पुरुष] अन्न को सुनकर ही तृप्त हो जाता ॥ ६ ॥