तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७ ॥
tattvacājighṛkṣattannāśaknottvacā grahītuṃ sa yaddhainattvacāgrahaiṣyatspṛṣṭvā haivānnamatrapsyat .. 7 ..
उसने इसे त्वचा से ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह त्वचा से ग्रहण न कर सका । यदि वह इसे त्वचा से ग्रहण कर लेता तो [इस समय भी पुरुष] अन्न को स्पर्श करके तृप्त हो जाया करता ॥ ७ ॥