अध्याय 1 खण्ड 3 - मन्त्र 8

तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८ ॥

tanmanasājighṛkṣattannāśaknonmanasā grahītuṃ sa yaddhainanmanasāgrahaiṣyaddhyātvā haivānnamatrapsyat .. 8 ..


उसने इसे मन से ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह मन से ग्रहण न कर सका । यदि वह इसे मन से ग्रहण कर लेता तो [इस समय भी पुरुष] अन्न का ध्यान करके ही तृप्त हो जाया करता ॥ ८ ॥