तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ९ ॥
tacchiśnenājighṛkṣattannāśaknocchiśnena grahītuṃ sa yaddhainacchiśnenāgrahaiṣyadvisṛjya haivānnamatrapsyat .. 9 ..
उसने इसे शिश्न (लिंग)-से ग्रहण करना चाहा; परन्तु वह शिश्न से ग्रहण करने में समर्थ न हुआ । यदि वह इसे शिश्न से ग्रहण कर लेता तो [इस समय भी पुरुष] अन्न का विसर्जन करके ही तृप्त हो जाता ॥ ९ ॥