अध्याय 2 खण्ड 1 - मन्त्र 1

पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति ।
यदेतद्रेतः तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति ।
तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥

puruṣe ha vā ayamādito garbho bhavati .
yadetadretaḥ tadetatsarvebhyo’ṅgebhyastejaḥ saṃbhūtamātmanyevātmānaṃ bibharti .
tadyadā striyāṃ siñcatyathainajjanayati tadasya prathamaṃ janma .. 1 ..


सबसे पहले यह पुरुषशरीर में ही गर्भरूप से रहता है । यह जो प्रसिद्ध रेतस् (वीर्य) है वह पुरुष के सम्पूर्ण अंगों से उत्पन्न हुआ तेज (सार) है । पुरुष इस आत्मभूत तेज को अपने [शरीर]-में ही पोषण करता है । फिर जिस समय वह इसे स्त्री में सींचता है तब इसे [गर्भरूप से] उत्पन्न करता है । यह इसका पहला जन्म है ॥ १ ॥

अविद्या, काम और कर्मजनित अभिमानवाला यह जीव ही यज्ञादि कर्म करके इस लोक से धूमादि क्रम से चन्द्रलोक को प्राप्त हो कर्मों के क्षीण होने पर वृष्टि आदि-क्रम से इस लोक को प्राप्त होने पर अन्नरूप से पुरुषरूप अग्नि में हवन किया जाता है । उस पुरुष में यह संसारी जीव रसादिक्रम से सबसे पहले शुक्ररूप से गर्भ होता है । इसी बात को ‘यह जो पुरुष में रेतस् है तद्रूप से [गर्भ होता है]’ इस वाक्य से कहा है ।

वह यह रेतस् (शुक्र) अन्नमय पिण्ड के रसादिरूप सम्पूर्ण अंग यानी अवयवों से तेज—शरीर का सारभूत निष्पन्न हुआ है । वह पुरुष का आत्मभूत होने के कारण ‘आत्मा’ है । शुक्ररूप से गर्भीभूत हुए उस आत्मा को पुरुष अपने शरीर में ही धारण (पोषण) करता है ।

जिस समय भार्या ऋतुमती होती है उस समय पिता उस शुक्र को स्त्रीरूप अग्नि—अर्थात् स्त्री [-की योनि]-में उससे संयोग करके सींचता है उस समय वह इस शुक्र को अपने गर्भरूप से उत्पन्न करता है । इस प्रकार रेतःसिंचनकाल में रेतोरूप से अपने स्थान से निकलना ही इस संसारी पुरुष का प्रथम जन्म अर्थात् प्रथमावस्था की अभिव्यक्ति है । यही बात “असावात्मा अमुमात्मानम्” इत्यादि वाक्य से पहले कही गयी है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अयमेवाविद्याकामकर्माभिमानवान् यज्ञादिकर्मकृत्वास्माल्लोकाद् धूमादिक्रमेण चन्द्रमसं प्राप्य क्षीणकर्मा वृष्ट्यादिक्रमेणेमं लोकं प्राप्य अन्नभूतः पुरुषाग्नौ हुतः । तस्मिन्पुरुषे ह वा अयं संसारी रसादिक्रमेण आदितः प्रथमतौ रेतोरूपेण गर्भो भवतीत्येतदाह यदेतत्पुरुषे रेतस्तेन रूपेणेति ।

तच्चैतद्रेतोऽन्नमयस्य पिण्डस्य सर्वेभ्योऽङ्गेभ्योऽवयवेभ्यो रसादिलक्षणेभ्यस्तेजः साररूपं शरीरस्य संभूतं परिनिष्पन्नं तत्पुरुषस्यात्मभूतत्वादात्मा । तमात्मानं रेतोरूपेण गर्भीभूतमात्मन्येव स्वशरीर एवात्मानं बिभर्ति धारयति ।

तद्रेतो यदा यस्मिन्काले भार्यर्तुमती तस्यां योषाग्नौ स्त्रियां सिञ्चत्युपगच्छन्, अथ तदैनदेतद्रेत आत्मनो गर्भीभूतं जनयति पिता । तदस्य पुरुषस्य स्थानान्निर्गमनं रेतःसेककाले रेतोरूपेणास्य संसारिणः प्रथमं जन्म प्रथमावस्थाभिव्यक्तिः । तदेतदुक्तं पुरस्तात् “असावात्मामुमात्मानम्” इत्यादिना ॥ १ ॥