यथा स्वमङ्गं तथा ।
तस्मादेनां न हिनस्ति ।
सास्यैतमात्मानमत्रगतं भावयति ॥ २ ॥
tatstriyā ātmabhūtaṃ gacchati .
yathā svamaṅgaṃ tathā .
tasmādenāṃ na hinasti .
sāsyaitamātmānamatragataṃ bhāvayati .. 2 ..
वह वीर्य जिस स्त्री में सींचा जाता है उस स्त्री के आत्मभाव अर्थात् पिता के शरीर के समान उसके शरीर से अभिन्नता को प्राप्त हो जाता है । जिस प्रकार अपने अंग स्तनादि (देह से पृथक् नहीं) होते हैं उसी प्रकार यह भी हो जाता है । इसीलिये यह गर्भ पिटक (आन्तरिक व्रणरूप ग्रन्थि) आदि के समान उस माता को कष्ट नहीं देता । क्योंकि वह स्तनादि अपने अंग के समान शरीर से अभेद को प्राप्त हो जाता है इसलिये वह [किसी प्रकार का] कष्ट यानी बाधा नहीं पहुँचाता—यह इसका तात्पर्य है ।
वह गर्भिणी इस अपने पति के आत्मा को यहाँ—अपने उदर में प्रविष्ट हुआ जानकर गर्भ के विरोधी भोजनादि को त्यागकर अनुकूल भोजनादि का उपयोग करती हुई उसका पालन करती है ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तद्रेतो यस्यां स्त्रियां सिक्तं सत्तस्या आत्मभूयमात्माव्यतिरेकतां यथा पितुरेवं गच्छति प्राप्नोति यथा स्वमङ्गं स्तनादि तथा तद्वदेव । तस्माद्धेतोरैनां मातरं स गर्भो न हिनस्ति पिटकादिवत् । यस्मात्स्तनादिस्वाङ्गवदात्मभूतं गतं तस्मान्न हिनस्ति न बाधत इत्यर्थः ।
सा अन्तर्वत्न्येतमस्य भर्तुरात्मानमत्रात्मन उदरे गतं प्रविष्टं बुद्ध्वा भावयति वर्धयति परिपालयति गर्भविरुद्धाशनादिपरिहारमनुकूलाशनाद्युपयोगं च कुर्वती ॥ २ ॥