तं स्त्री गर्भं बिभर्ति ।
सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति ।
स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या ।
एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥
sā bhāvayitrī bhāvayitavyā bhavati .
taṃ strī garbhaṃ bibharti .
so’gra eva kumāraṃ janmano’gre’dhibhāvayati .
sa yatkumāraṃ janmano’gre’dhibhāvayatyātmānameva tadbhāvayatyeṣāṃ lokānāṃ santatyā .
evaṃ santatā hīme lokāstadasya dvitīyaṃ janma .. 3 ..
गर्भूत पति के आत्मा की वृद्धि करनेवाली वह स्त्री अपने स्वामी द्वारा वर्धयितव्या—पालनीया होती है; क्योंकि लोक में उपकार-प्रत्युपकार के बिना किसी के साथ किसी का सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है । जन्म होने से पूर्व उस गर्भ को वह स्त्री गर्भधारण की यथोक्त विधि से धारण-पोषण करती है । तथा वह पिता [जन्म होने के बाद] पहले ही जन्म लेते ही उस कुमार का जन्म के अनन्तर जातकर्मादि द्वारा संस्कार करता है । वह पिता जो जन्म के अनन्तर उस सद्योजात कुमार का जातकर्म आदि से संस्कार करता है सो मानो अपना ही संस्कार करता है; क्योंकि पिता का आत्मा ही पुत्ररूप से उत्पन्न होता है । यही बात “पतिर्जायां प्रविशति” इत्यादि वाक्यों में कही है ।
पिता अपने को पुत्ररूप से उत्पन्न करके क्यों संस्कार करता है? इसपर कहते हैं—इन लोकों के विस्तार अर्थात् अविच्छेद के लिये । यदि कोई पुत्रोत्पादनादि न करें तो ये लोक विच्छिन्न हो जायँ । इस प्रकार, क्योंकि पुत्रोत्पादनादि कर्मों का विच्छेद न होने के कारण ही ये लोक वृद्धि को प्राप्त होकर प्रवाहरूप से वर्तमान रहते हैं, इसलिये उनके अविच्छेद के लिये उस [पुत्रोत्पादनादि]-को करना चाहिये; मोक्ष के लिये नहीं—यह इसका अभिप्राय है । इस प्रकार कुमाररूप से जो माता के उदर से बाहर निकलना है वही इस संसारी जीव का रेतोरूप जन्म की अपेक्षा दूसरा जन्म यानी इसकी द्वितीय अवस्था की अभिव्यक्ति है ॥ ३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सा भावयित्री वर्धयित्री भर्तुरात्मनो गर्भीभूतस्य भावयितव्या वर्धयितव्या रक्षयितव्या च भर्त्रा भवति । न ह्युपकारप्रत्युपकारमन्तरेण लोके कस्यचित्केनचित्सम्बन्ध उपपद्यते । तं गर्भं स्त्री यथोक्तेन गर्भधारणविधानेन बिभर्ति धारयत्यग्रे प्राग्जन्मनः । स पिता अग्र एव पूर्वमेव जातमात्रं जन्मनोऽध्यूर्ध्वं जन्मनो जातं कुमारं जातकर्मादिना पिता भावयति । स पिता यद्यस्मात्कुमारं जन्मनोऽध्यूर्ध्वमग्रे जातमात्रमेव जातकर्मादिना यद्भावयति । तदात्मानमेव भावयति । पितुरात्मैव हि पुत्ररूपेण जायते । तथा ह्युक्तम् “पतिर्जायां प्रविशति” (हरि० ३ । ७३ । ३१) इत्यादि ।
तत्किमर्थमात्मानं पुत्ररूपेण जनयित्वा भावयतीत्युच्यते—एषां लोकानां सन्तत्या अविच्छेदायेत्यर्थः । विच्छिद्येरन्हीमे लोकाः पुत्रोत्पादनादि यदि न कुर्युः केचन । एवं पुत्रोत्पादनादिकर्माविच्छेदेनैव सन्तताः प्रबन्धरूपेण वर्तन्ते हि यस्मादिमे लोकास्तस्मात्तदविच्छेदाय तत्कर्तव्यं न मोक्षायेत्यर्थः । तदस्य संसारिणः कुमाररूपेण मातुरुदराद्यन्निर्गमनं तद्रेतोरूपापेक्षया द्वितीयं जन्म द्वितीयावस्थाभिव्यक्तिः ॥ ३ ॥