अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति ।
स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥
so’syāyamātmā puṇyebhyaḥ pratidhīyate .
athāsyāyamitara ātmā kṛtakṛtyo vayogataḥ praiti .
sa itaḥ prayanneva punarjāyate tadasya tṛtīyaṃ janma .. 4 ..
इस पिता का वह यह पुत्ररूप आत्मा पुण्य यानी शास्त्रोक्त कर्मों के निमित्त अर्थात् कार्यसम्पादन के लिये पिता के स्थान पर प्रतिनिधि स्थापित किया जाता है । अर्थात् पिता को जो कुछ करना चाहिये उसे करने के लिये यह प्रतिनिधि होता है । यही बात बृहदारण्यकोपनिषद् में संप्रत्तिविद्या के प्रकरण में पिता से शिक्षा पाकर पुत्र कहता है—“मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ” इत्यादि ।
तदनन्तर पुत्र पर अपना भार छोड़कर इस पुत्र का यह पितारूप दूसरा आत्मा कृतकृत्य यानी कर्तव्यरूप ऋणत्रय से मुक्त होकर अर्थात् अपना कर्तव्य सम्पादन करके वयोगत होकर—अवस्था समाप्त हो जाने पर अर्थात् वृद्ध होने पर प्रेत— मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । वह यहाँ से जाते समय अर्थात् शरीर को त्यागता हुआ ही तिनके की जोंक आदि के समान कर्मोपलब्ध अन्य देह को प्राप्त करके पुनः उत्पन्न होता है । वह जो इसे मरने पर प्राप्त हुआ करता है, इसका तीसरा जन्म है ।
शंका—संसारी जीव का पिता से वीर्यरूप से पहला जन्म बतलाया; उसीका कुमाररूप से माता से दूसरा जन्म कहा । अब उसीका तीसरा जन्म बतलाते समय उसके मृत पिता का जो जन्म होता है वही इसका तीसरा जन्म है— ऐसा क्यों कहा गया?
समाधान—पिता और पुत्र की एकात्मता बतलानी इष्ट होने के कारण ऐसा कहने में कोई दोष नहीं है । वह पुत्र भी अपने पिता के समान अपने पुत्र पर भार छोड़कर यहाँ से कूच करने पर फिर उत्पन्न होता ही है । यह बात एक के प्रति कही जाने पर दूसरे के लिये भी कह ही दी गयी है—ऐसा श्रुति मानती है; क्योंकि पिता और पुत्र एकरूप ही हैं ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अस्य पितुः सोऽयं पुत्रात्मा पुण्येभ्यः शास्त्रोक्तेभ्यः कर्मभ्यः कर्मनिष्पादनार्थं प्रतिधीयते पितुः स्थाने पित्रा यत्कर्तव्यं तत्करणाय प्रतिनिधिधीयत इत्यर्थः । तथा च संप्रत्तिविद्यायां वाजसनेयके पित्रानुशिष्टः—“अहं ब्रह्माहं यज्ञः” (बृ० उ० १ । ५ । १७) इत्यादि प्रतिपद्यत इति ।
अथानन्तरं पुत्रे निवेश्यात्मनो भारमस्य पुत्रस्येतरोऽयं यः पित्रात्मा कृतकृत्यः कर्तव्यादृणत्रयाद्विमुक्तः कृतकर्तव्य इत्यर्थः, वयोगतो गतवया जीर्णः सन्प्रैति म्रियते । स इतोऽस्मात्प्रयन्नेव शरीरं परित्यजन्नेव तृणजलूकावद् देहान्तरमुपाददानः कर्मचितं पुनर्जायते । तदस्य मृत्वा प्रतिपत्तव्यं यत्तत्तृतीयं जन्म ।
ननु संसरतः पितुः सकाशाद्रेतोरूपेण प्रथमं जन्म । तस्यैव कुमाररूपेण मातुर्द्वितीयं जन्मोक्तम् । तस्यैव तृतीये जन्मनि वक्तव्ये प्रेतस्य पितुर्यज्जन्म तत्तृतीयमिति कथमुच्यते?
नैष दोषः; पितापुत्रयोरैकात्म्यस्य विवक्षितत्वात् । सोऽपि पुत्रः स्वपुत्रे भारं निधायेतः प्रयन्नेव पुनर्जायते यथा पिता । तदन्यत्रोक्तमितरत्राप्युक्तमेव भवतीति मन्यते श्रुतिः; पितापुत्रयोरेकात्मत्वात् ॥ ४ ॥