अध्याय 2 खण्ड 1 - मन्त्र 5

तदुक्तमृषिणा—गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ।
शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति ।
गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥

taduktamṛṣiṇā—garbhe nu sannanveṣāmavedamahaṃ devānāṃ janimāni viśvā .
śataṃ mā pura āyasīrarakṣannadhaḥ śyeno javasā niradīyamiti .
garbha evaitacchayāno vāmadeva evamuvāca .. 5 ..


यही बात ऋषि (मन्त्र)-ने भी कही है—‘मैंने गर्भ में रहते हुए ही इन देवताओं के सम्पूर्ण जन्मों को जान लिया है । [तत्त्वज्ञान होने से पूर्व] मुझे सैकड़ों लोहमय (लोहे के समान सुदृढ़) शरीरों ने अवरुद्ध किया हुआ था । अब [तत्त्वज्ञान के प्रभाव से] मैं श्येन पक्षी के समान [उनका छेदन करके] बाहर निकल आया हूँ’—वामदेव ने गर्भ में शयन करते समय ही ऐसा कहा था ॥ ५ ॥

यही बात ऋषि यानी मन्त्र ने भी कही है, सो बतलाते हैं—

‘गर्भे नु’—माता के गर्भ में रहते हुए ही—यहाँ ‘नु’ शब्द वितर्क का बोध कराता है—अनेक जन्मान्तरों की भावना के परिपाकवश मैंने इन वाक् एवं अग्नि आदि देवताओं के सम्पूर्ण जन्मों का अनुभव—बोध प्राप्त किया है । मुझे संसारबन्धन से मुक्त होने से पूर्व आयसी अर्थात् लोहमयी के समान सैकड़ों—अनेकों अभेद्य पुरियों—शरीरों ने सुरक्षित (अवरुद्ध) किया हुआ था । अब जाल को काटकर वेग से उड़ जानेवाले श्येन (बाज पक्षी)-के समान मैं आत्मज्ञानजनित सामर्थ्य के द्वारा उससे बाहर निकल आया हूँ—अहो! वामदेव ऋषि ने गर्भ में शयन करते हुए ही ऐसा कहा था ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

एतद्वस्तु तदृषिणा मन्त्रेणाप्युक्तमित्याह—

गर्भे नु मातृगर्भाशय एव सन् । न्विति वितर्के । अनेकजन्मान्तरभावनापरिपाकवशादेषां देवानां वागग्न्यादीनां जनिमानि जन्मानि विश्वा विश्वानि सर्वाण्यन्ववेदमहमहो अनुबुद्धवानस्मीत्यर्थः शतमनेका बह्वयो मा मां पुर आयसीः, आयस्यो लोहमय्य इवाभेद्यानि शरीराणीत्यभिप्रायः, अरक्षनरक्षितवत्यः संसारपाशनिर्गमनादधः । अथ श्येन इव जालं भित्त्वा जवसा आत्मज्ञानकृतसामर्थ्येन निरदीयं निर्गतोऽस्मि । अहो गर्भ एव शयानो वामदेव ऋषिरेवमुवाचैतत् ॥ ५ ॥