अध्याय 2 खण्ड 1 - मन्त्र 6

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयेऽध्याये प्रथमः खण्डः समाप्तः ।

उपनिषत्क्रमेण द्वितीयः, आरण्यकक्रमेण पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ।

स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत् ॥ ६ ॥

sa evaṃ vidvānasmāccharīrabhedādūrdhva utkramyāmuṣminsvarge loke sarvānkāmānāptvāmṛtaḥ samabhavatsamabhavat .. 6 ..


वह [वामदेव ऋषि] ऐसा ज्ञान प्राप्तकर इस शरीर का नाश होने के अनन्तर उत्क्रमणकर इन्द्रियों के अविषयभूत स्वर्ग (स्वप्रकाश) लोक में सम्पूर्ण भोगों को प्राप्तकर अमर हो गया, [अमर] हो गया ॥ ६ ॥
वह वामदेव ऋषि पूर्वोक्त आत्मा को इस प्रकार जानकर इस शरीर का नाश होने के अनन्तर अर्थात् लोहमय के समान दुर्भेद्य और जन्म-मरणादि अनेक प्रकार के सैकड़ों अनर्थों से समन्वित इस अविद्यापरिकल्पित शरीरपरम्परा का परमात्मज्ञानरूप अमृत के उपयोग (आस्वाद)-से प्राप्त हुई शक्तिद्वारा भेद होने पर यानी शरीरोत्पत्ति के बीजभूत अविद्या आदि निमित्त की निवृत्ति से होनेवाले देहपात के अनन्तर ऊर्ध्व अर्थात् परमात्मभाव को प्राप्त हो अधोभाव यानी संसार से ऊपर उठ तत्त्वज्ञान से उद्भासित निर्मल सर्वात्मभाव को प्राप्त हो उस (इन्द्रियों से अगोचर) पूर्वोक्त अजर, अमर, अमृत, अभय, सर्वज्ञ, अपूर्व, अनन्य, अनन्तर, अबाह्य और एकमात्र प्रज्ञानामृतस्वरूप स्वर्गलोक में दीपक की भाँति शान्त हो गया; अर्थात् अपने आत्मा—स्व-स्वरूप में स्थित होकर अमृत हो गया । भाव यह है कि आत्मज्ञान द्वारा पहलेही से पूर्णकाम होने के कारण अर्थात् जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्तकर [वह अमरत्व को प्राप्त हो गया] । फल और उदाहरण के सहित आत्मज्ञान की सम्यक् समाप्ति सूचित करने के लिये यहाँ [समभवत्-समभवत्—ऐसी] द्विरुक्ति की गयी है ॥ ६ ॥
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स वामदेव ऋषिर्यथोक्तमात्मानमेव विद्वानस्माच्छरीरभेदाच्छरीरस्याविद्यापरिकल्पितस्य आयसवदनिर्वेद्यस्य जननमरणाद्यनेकानर्थशताविष्टशरीरप्रबन्धस्य परमात्मज्ञानामृतोपयोगजनितवीर्यकृतभेदाच्छरीरोत्पत्तिबीजाविद्यादिनिमित्तोपमर्दहेतोः शरीरविनाशादित्यर्थः । ऊर्ध्वः परमात्मभूतः सन्नधोभावात्संसारादुत्क्रम्य ज्ञानावद्योतितामलसर्वात्मभावमापन्नः सन्नमुष्मिन्यथोक्तेऽजरेऽमरेऽमृतेऽभये सर्वज्ञेऽपूर्वेऽनपरेऽनन्तरेऽबाह्ये प्रज्ञानामृतैकरसे प्रदीपवन्निर्वाणमत्यगमत्स्वर्गे लोके स्वस्मिन्नात्मनि स्वे स्वरूपेऽमृतः समभवत् । आत्मज्ञानेन पूर्वमाप्तकामतया जीवन्नेव सर्वान्कामानाप्त्वेत्यर्थः । द्विर्वचनं सफलस्य सोदाहरणस्यात्मज्ञानस्य परिसमाप्तिप्रदर्शनार्थम् ॥ ६ ॥

तृतीयोऽध्यायः

प्रथम खण्ड

आत्मसम्बन्धी प्रश्न

श्रुतिद्वारा वामदेव आदि आचार्यों की परम्परा से प्रकाशित तथा ब्रह्मवेत्ताओं की सभा में अत्यन्त प्रसिद्ध, ब्रह्मविद्यारूप साधन के किये हुए सर्वात्मभावरूप फल की प्राप्ति को उपलब्ध करनेवाले आधुनिक मुमुक्षु और ब्रह्मजिज्ञासु ब्राह्मणलोग जीवभावपर्यन्त साध्य-साधनरूप अनित्य संसार से निवृत्त होने की इच्छा से परस्पर विचार करते हुए पूछते हैं—यह आत्मा कौन है? किस प्रकार [पूछते हैं? सो बतलाया जाता है]—
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ब्रह्मविद्यासाधनकृतसर्वात्मभावफलावाप्तिं वामदेवाद्याचार्यपरम्परया श्रुत्यावद्योत्यमानां ब्रह्मवित्परिषद्यत्यन्तप्रसिद्धामुपलभमाना मुमुक्षवो ब्राह्मणा अधुनातना ब्रह्मजिज्ञासवोऽनित्यात्साध्यसाधनलक्षणात्संसारादाजीवभावाद् व्याविवृत्सवो विचारयन्तोऽन्योन्यं पृच्छन्ति कोऽयमात्मेति? कथम्—