अध्याय 3 खण्ड 1 - मन्त्र 1

कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे ।
कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ॥ १ ॥

ko’yamātmeti vayamupāsmahe .
kataraḥ sa ātmā, yena vā paśyati yena vā śṛṇoti yena vā gandhānājighrati yena vā vācaṃ vyākaroti yena vā svādu cāsvādu ca vijānāti .. 1 ..


हम जिसकी उपासना करते हैं वह यह आत्मा कौन है? जिससे [प्राणी] देखता है, जिससे सुनता है, जिससे गन्धों को सूँघता है, जिससे वाणी का विश्लेषण करता है और जिससे स्वादु-अस्वादु का ज्ञान प्राप्त करता है वह [श्रुतिकथित दो आत्माओं में से] कौन-सा आत्मा है? ॥ १ ॥

हम जिस आत्मा की ‘यह आत्मा है’ इस प्रकार साक्षात् उपासना करते हैं वह आत्मा कौन है? तथा जिस आत्मा की ‘यह आत्मा है’ इस प्रकार साक्षात् उपासना करनेवाला वामदेव अमर हो गया था उसी आत्मा की हम उपासना करते हैं । किन्तु वस्तुतः वह आत्मा है कौन-सा?

इस प्रकार जिज्ञासापूर्वक एक-दूसरे से प्रश्न करते हुए उन्हें आत्म-सम्बन्धी विशेष विवरण से युक्त पूर्वोक्त श्रुति के संस्कार से यह स्मृति पैदा हुई—‘इस पुरुष में ब्रह्म पादाग्रभाग द्वारा प्रविष्ट हुआ’ तथा इसी पुरुष में ‘वह इस सीमा को ही विदीर्णकर इसके द्वारा प्राप्त हुआ ।’ इस प्रकार यहाँ एक-दूसरे से प्रतिकूल दो ब्रह्म ज्ञात होते हैं और वे इस पिण्ड के आत्मस्वरूप हैं । इनमें से कोई एक ही आत्मा उपासनीय हो सकता है । इनमें जो उपासनीय है वह आत्मा कौन-सा है? इस विशेष बात को निश्चय करने के लिये उन्होंने आपस में विचार करते हुए एक-दूसरे से फिर पूछा ।

फिर आपस में विचार करनेवाले उन मुमुक्षुओं को अपने विचारणीय विशेष विषय के सम्बन्ध में यह बुद्धि पैदा हुई । किस प्रकार पैदा हुई? [सो बतलाते हैं—] इस पिण्ड में दो वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं—एक तो जिस चक्षु आदि अनेक प्रकार के भेदों से विभिन्न साधन (इन्द्रियग्राम)-द्वारा [पुरुष विषयों को] उपलब्ध करता है और दूसरा जो उपलब्ध किया करता है; क्योंकि वह भिन्न-भिन्न इन्द्रियों द्वारा उपलब्ध हुए विषयों की स्मृति का अनुसन्धान करता है । उनमें से जिसके द्वारा पुरुष उपलब्ध करता है वह तो आत्मा हो नहीं सकता ।

तो फिर वह किसके द्वारा उपलब्ध करता है, सो बतलाया जाता है—नेत्र के साथ एकीभूत हुए जिस श्रोत्रभावापन्न के द्वारा वह शब्द श्रवण करता है, जिस घ्राणेन्द्रियभूत से वह गन्धों को सूँघता है, जिस वागिन्द्रियभूत से वह गौ-अश्व इत्यादि नामात्मिका तथा साधु-असाधु वाणी का विश्लेषण करता है और जिस रसनेन्द्रियभूत से वह स्वादु-अस्वादु पदार्थों को जानता है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यमात्मानमयमात्मेति साक्षाद्वयमुपास्महे कः स आत्मेति यं चात्मानमयमात्मेति साक्षादुपासीनो वामदेवोऽमृतः समभवत्तमेव वयमप्युपास्महे को नु खलु स आत्मेति ।

एवं जिज्ञासापूर्वमन्योन्यं पृच्छतामतिक्रान्तविशेषविषयश्रुतिसंस्कारजनिता स्मृतिरजायत । ‘तं प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषम्’ ‘स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत’ एतमेव पुरुषम् । अत्र द्वे ब्रह्मणी इतरेतरप्रातिकूल्येन प्रतिपन्ने इति । ते चास्य पिण्डस्यात्मभूते । तयोरन्यतर आत्मोपास्यो भवितुमर्हति । योऽत्रोपास्यः कः स आत्मेति विशेषनिर्धारणार्थं पुनरन्योन्यं पप्रच्छुर्विचारयन्तः ।

पुनस्तेषां विचारयतां विशेषविचारणास्पदविषया मतिरभूत् । कथम्? द्वे वस्तुनी अस्मिन् पिण्ड उपलभ्येते । अनेकभेदभिन्नेन करणेन येनोपलभते । यश्चैक उपलभते । करणान्तरोपलब्धविषयस्मृतिप्रतिसन्धानात् । तत्र न तावद्येनोपलभते स आत्मा भवितुमर्हति ।

केन पुनरुपलभत इत्युच्यते येन वा चक्षुर्भूतेन रूपं पश्यति । येन वा शृणोति श्रोत्रभूतेन शब्दम्, येन वा घ्राणभूतेन गन्धानाजिघ्रति, येन वा वाक्करणभूतेन वाचं नामात्मिकां व्याकरोति गौरश्व इत्येवमाद्यां साध्वसाध्विति च, येन वा जिह्वाभूतेन स्वादु चास्वादु च विजानातीति ॥ १ ॥


प्रज्ञानसंज्ञक मनके अनेक नाम

पहले जो एक ही अनेक प्रकार से विभिन्न करण बतलाया है वह कौन है? इसपर कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
किं पुनस्तदेवैकमनेकधा भिन्नं करणम्? इत्युच्यते—