संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः सङ्कल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २ ॥
yadetaddhṛdayaṃ manaścaitat .
saṃjñānamājñānaṃ vijñānaṃ prajñānaṃ medhā dṛṣṭirdhṛtirmatirmanīṣā jūtiḥ smṛtiḥ saṅkalpaḥ kraturasuḥ kāmo vaśa iti sarvāṇyevaitāni prajñānasya nāmadheyāni bhavanti .. 2 ..
पहले जो कहा है कि प्रजाओं का रेतस् (सारभूत) हृदय है, हृदय का सारभूत मन है, मन से जल और वरुण की सृष्टि हुई; हृदय से मन हुआ और मन से चन्द्रमा । वह यह हृदय ही मन भी है । वह एक ही अनेक रूप हो रहा है । इस एक अन्तःकरण से ही नेत्ररूप से रूप को देखता है, श्रोत्ररूप से श्रवण करता है, घ्राणरूप से सूँघता है, वागिन्द्रियरूप से बोलता है, जिह्वारूप से चखता है, स्वयं संकल्प-विकल्परूप मन से संकल्प करता है और हृदयरूप से निश्चय करता है । अतः उपलब्धा की समस्त उपलब्धियों के लिये इन्द्रियसम्बन्धी सारे व्यापारों को करनेवाला यही एक साधन है ।
इसी प्रकार कौषीतकी उपनिषद् में भी कहा है—“प्रज्ञा द्वारा वाणी पर आरूढ होकर वाणी से सम्पूर्ण नामों को प्राप्त (ग्रहण) करता है, प्रज्ञा द्वारा चक्षु इन्द्रिय पर आरूढ होकर चक्षु से सारे रूपों को प्राप्त करता है” इत्यादि । तथा बृहदारण्यक में कहा है—“मन से ही देखता है, मन से ही सुनता है, हृदय से ही रूपों का ज्ञान प्राप्त करता है” इत्यादि । अतः हृदय और मनःशब्दवाच्य अन्तःकरण का ही सब प्रकार की उपलब्धि में साधनत्व प्रसिद्ध है । प्राण भी तद्रूप ही है । “जो प्राण है वही प्रज्ञा है और जो प्रज्ञा है वही प्राण है” ऐसा ब्राह्मणवाक्य है ।
‘प्राण इन्द्रियों का संघातरूप है’ यह बात हम प्राणसंवाद आदि प्रकरणों में कह चुके हैं । अतः जिसने चरणों की ओर से प्रवेश किया था वह ब्रह्म उपलब्धा की उपलब्धि का साधन होने के कारण गौण होने से मुख्य ब्रह्म अर्थात् उपास्य आत्मा नहीं हो सकता । अतः पारिशेष्यनियमानुसार जिस उपलब्धा की उपलब्धि के लिये इस हृदय एवं मनोरूप अन्तःकरण की आगे बतलायी जानेवाली वृत्तियाँ होती हैं वह उपलब्धा ही हमारा उपासनीय आत्मा है—ऐसा उन्होंने निश्चय किया ।
उस अन्तःकरणरूप उपाधि में स्थित प्रज्ञानरूप उपलब्धा ब्रह्म की उपलब्धि के लिये जो बाह्य और आन्तरिक विषयों से सम्बन्ध रखनेवाली अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं वे ये बतलायी जाती हैं—‘संज्ञान-संज्ञप्ति अर्थात् चेतनभाव, आज्ञान—आज्ञा करना अर्थात् ईश्वरभाव (प्रभुता), विज्ञान—कलादि का ज्ञान, प्रज्ञान—प्रज्ञप्ति यानी प्रज्ञता (समयोचित बुद्धि स्फुरित हो जाना—प्रतिभा), मेधा—ग्रन्थधारण की शक्ति, दृष्टि—इन्द्रियों द्वारा सब विषयों को उपलब्ध करना, धृति—धारण करना, जिससे शिथिल हुए शरीर और इन्द्रियों में जागृति होती है, ‘धृति से ही शरीर को उठाकर वहन करते हैं’ ऐसा [पण्डितजन] कहते भी हैं, मति—मनन करना, मनीषा—मनन करने की स्वतन्त्रता, जूति—चित्त का रोगादि से दुःखी होना, स्मृति—स्मरण, संकल्प—शुक्ल-कृष्णादि-भाव से रूपादि का संकल्प करना, क्रतु—अध्यवसाय, असु—जीवन की निमित्तभूत श्वासोच्छ्वासादि क्रिया, काम—अप्राप्त विषय की आकांक्षा यानी तृष्णा और वश—स्त्रीसंसर्गादि की अभिलाषा—इत्यादि प्रकार की अन्तःकरण की वृत्तियाँ प्रज्ञप्तिरूप उपलब्धा की उपलब्धि के लिये होने के कारण विशुद्धबोधस्वरूप ब्रह्म की उपाधिभूत हैं ।
अतः उसकी उपाधिजनित गुणवृत्ति से ये संज्ञान आदि उस ब्रह्म के ही नाम हैं । ये सभी प्रज्ञप्तिमात्र प्रधान के नाम ही हैं; स्वतः साक्षात् कुछ नहीं हैं ऐसा ही कहा भी है—“प्राणन करने के कारण ही [ब्रह्म] प्राण नामवाला है” इत्यादि ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यदुक्तं पुरस्तात्प्रजानां रेतो हृदयं हृदयस्य रेतो मनो मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमाः । तदेवैतद्धृदयं मनश्च, एकमेव तदनेकधा । एतेनान्तःकरणेनैकेन चक्षुर्भूतेन रूपं पश्यति श्रोत्रभूतेन शृणोति घ्राणभूतेन जिघ्रति वाग्भूतेन वदति जिह्वाभूतेन रसयति स्वेनैव विकल्पनारूपेण मनसा विकल्पयति हृदयरूपेणाध्यवस्यति । तस्मात्सर्वकरणविषयव्यापारकमेकमिदं करणं सर्वोपलब्ध्यर्थमुपलब्धुः ।
तथा च कौषीतकीनां “प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति । प्रज्ञया चक्षुः समारुह्य चक्षुषा सर्वाणि रूपाण्याप्नोति” (३ । ६) इत्यादि ।
वाजसनेयके च—“मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति हृदयेन हि रूपाणि जानाति” (बृ० उ० १ । ५ । ३) इत्यादि । तस्माद्धृदयमनोवाच्यस्य सर्वोपलब्धिकरत्वं प्रसिद्धम् । तदात्मकश्च प्राणो “यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स प्राणः” (कौषी० ३ । ३) इति हि ब्राह्मणम् ।
करणसंहतिरूपश्च प्राण इत्यवोचाम प्राणसंवादादौ । तस्माद्यत्पद्भ्यां प्रापद्यत तद्ब्रह्म तदुपलब्धुरुपलब्धिकरणत्वेन गुणभूतत्वान्नैव तद्वस्तु ब्रह्मोपास्यात्मा भवितुमर्हति । पारिशेष्याद्यस्योपलब्धुरुपलब्ध्यर्था एतस्य हृदयस्य मनोरूपस्य करणस्य वृत्तयो वक्ष्यमाणाः । स उपलब्धोपास्य आत्मानोऽस्माकं भवितुमर्हतीति निश्चयं कृतवन्तः ।
तदन्तःकरणोपाधिस्थस्योपलब्धुः प्रज्ञारूपस्य ब्रह्मण उपलब्ध्यर्था या अन्तःकरणवृत्तयो बाह्यान्तर्वर्तिविषयविषयास्ता इमा उच्यन्ते । संज्ञानं संज्ञप्तिश्चेतनभावः, आज्ञानमाज्ञप्तिरीश्वरभावः, विज्ञानं कलादिपरिज्ञानम्, प्रज्ञानं प्रज्ञप्तिः प्रज्ञता, मेधा ग्रन्थधारणसामर्थ्यम्, दृष्टिरिन्द्रियद्वारा सर्वविषयोपलब्धिः, धृतिर्धारणमवसन्नानां शरीरेन्द्रियाणां ययोत्तम्भनं भवति—धृत्या शरीरमुद्वहन्तीति हि वदन्ति, मतिर्मननम्, मनीषा तत्र स्वातन्त्र्यम्, जूतिश्चेतसो रुजादिदुःखित्वभावः, स्मृतिः स्मरणम्, सङ्कल्पः शुक्लकृष्णादिभावेन सङ्कल्पनं रूपादीनाम्, क्रतुरध्यवसायः, असुः प्राणनादिजीवनक्रियानिमित्तावृत्तिः, कामोऽसंनिहितविषयाकाङ्क्षा तृष्णा, वशः स्त्रीव्यतिकराद्यभिलाषः, इत्येवमाद्या अन्तःकरणवृत्तयः प्रज्ञप्तिमात्रस्योपलब्धुरुपलब्ध्यर्थत्वाच्छुद्धप्रज्ञानरूपस्य ब्रह्मण उपाधिभूता-
स्तदुपाधिजनितगुणनामधेयानि भवन्ति संज्ञानादीनि । सर्वाण्येव एतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति न स्वतः साक्षात् । तथा चोक्तं “प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति” (बृ० उ० १ । ४ । ७) इत्यादि ॥ २ ॥