अध्याय 3 खण्ड 1 - मन्त्र 3

एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् ।
प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ३ ॥

eṣa brahmaiṣa indra eṣa prajāpatirete sarve devā imāni ca pañca mahābhūtāni pṛthivī vāyurākāśa āpo jyotīṃṣītyetānīmāni ca kṣudramiśrāṇīva bījānītarāṇi cetarāṇi cāṇḍajāni ca jārujāni ca svedajāni codbhijjāni cāśvā gāvaḥ puruṣā hastino yatkiṃcedaṃ prāṇi jaṅgamaṃ ca patatri ca yacca sthāvaraṃ sarvaṃ tatprajñānetram .
prajñāne pratiṣṭhitaṃ prajñānetro lokaḥ prajñā pratiṣṭhā prajñānaṃ brahma .. 3 ..


यह (प्रज्ञानरूप आत्मा) ही ब्रह्म है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति है, यही ये [अग्नि आदि] सारे देव तथा पृथिवी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये पाँच भूत हैं, यही क्षुद्र जीवों के सहित उनके बीज (कारण) और अन्य अण्डज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज्ज, अश्व, गौ, मनुष्य एवं हाथी हैं तथा [इनके अतिरिक्त] जो कुछ भी यह जंगम (पैर से चलनेवाले), पतत्रि (आकाश में उड़नेवाले) और स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) रूप प्राणिवर्ग है वह सब प्रज्ञानेत्र और प्रज्ञान (निरुपाधिक चैतन्य)-में ही स्थित है । लोक प्रज्ञानेत्र (प्रज्ञा—चैतन्य ही जिसका नेत्र—व्यवहार का कारण है ऐसा) है, प्रज्ञा ही उसका लयस्थान है, अतः प्रज्ञान ही ब्रह्म है ॥ ३ ॥

वह यह प्रज्ञानरूप आत्मा ही अपरब्रह्म है, अर्थात् सम्पूर्ण शरीरों में स्थित प्राण—प्रज्ञात्मा है । विभिन्न जलपात्रों में पड़े हुए प्रतिबिम्ब के समान यही अन्तःकरणरूप उपाधियों में अनुप्रविष्ट हिरण्यगर्भ—प्राण यानी प्रज्ञात्मा है । यही [‘इदमदर्शम्’ इस श्रुति में बतलाये हुए] गुण के कारण इन्द्र अथवा देवराज है । यही प्रजापति है, जो सवसे पहले उत्पन्न हुआ देहधारी है । जिससे मुखादिनिर्भेद के द्वारा अग्नि आदि लोकपाल उत्पन्न हुए हैं वह प्रजापति भी यही है । और भी ये जो अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता हैं वे भी यही हैं ।

ये जो समस्त शरीरों के उपादानभूत एवं अन्न और अन्नादत्वभाव को प्राप्त हुए पृथिवी आदि पंचभूत हैं, क्षुद्र यानी अल्प जीवों के सहित जो सर्पादि हैं तथा बीज—कारण और इतर—कार्यवर्ग इस प्रकार अलग-अलग दो विभागों से निर्दिष्ट [समस्त प्राणी हैं वे भी यही हैं] । [‘क्षुद्रमिश्राणीव’ इस पदसमूह में] ‘इव’ शब्द का प्रयोग अनर्थक है ।

वे कौन-कौन हैं, सो बतलाते हैं । अण्डज—पक्षी आदि, जारुज—जरायुज—मनुष्यादि, स्वेदज—जूँ आदि, उद्भिज्ज—वृक्षादि तथा अश्व, गौ, पुरुष, हाथी एवं अन्य भी ये जो कुछ प्राणी हैं—वे कौन-कौन-से? जंगम—जो पैरों से चलते हैं, पक्षी—जो आकाश में उड़नेवाले हैं और स्थावर—जो अचल हैं, वे सब यही हैं अर्थात् वे सब-के-सब प्रज्ञानेत्र हैं । प्रज्ञा प्रज्ञप्ति को कहते हैं और वह ब्रह्म ही है तथा जिससे नयन किया जाय [अर्थात् ले जाया जाय] उसे ‘नेत्र’ कहते हैं । इस प्रकार प्रज्ञा ही जिसका नेत्र है वह प्रज्ञानेत्र कहलाता है । तथा उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के समय प्रज्ञान यानी ब्रह्म में स्थित रहनेवाले अर्थात् प्रज्ञा के आश्रित हैं । इस प्रकार पूर्ववत् यह लोक प्रज्ञानेत्र है अर्थात् सभी लोक प्रज्ञारूप नेत्रवाला है, सम्पूर्ण जगत् का आश्रय प्रज्ञा ही है; अतः प्रज्ञान ही ब्रह्म है ।

जो सम्पूर्ण औपाधिक विशेषता से रहित, नित्य, निरंजन, निर्मल, निष्क्रिय, शान्त, एक और अद्वितीय है जो “नेति नेति” इत्यादि [श्रुतियों द्वारा] क्रम से समस्त विषयों का बाध करके जानने-योग्य है तथा सब प्रकार के शाब्दिक ज्ञान का अविषय है, अत्यन्त विशुद्ध प्रज्ञारूप उपाधि के सम्बन्ध से सर्वज्ञ तथा जगत् के सर्वसाधारण और अव्यक्त बीज का प्रवर्तक वह ईश्वर ही सबका नियन्ता होने के कारण ‘अन्तर्यामी’ नामवाला है; वही व्याकृत जगत् का बीजभूत विज्ञानात्मा का अभिमानी ‘हिरण्यगर्भ’ नामवाला है तथा वही ब्रह्माण्ड के भीतर सबसे पहले उत्पन्न हुए शरीररूप उपाधिवाला ‘विराट् प्रजापति’ संज्ञावाला है । वही उससे उत्पन्न हुए अग्नि आदि की उपाधि से ‘देवता’ संज्ञावाला है तथा उस ब्रह्म को ही ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त विशेष-विशेष शरीरों की उपाधियों में भी उन-उनके नाम और रूप प्राप्त हुए हैं । सम्पूर्ण उपाधिभेद से विभिन्न वही एक समस्त प्राणियों और तार्किकों द्वारा सब प्रकार से जाना जाता और अनेक प्रकार से कल्पना किया जाता है । [इस विषय में] “इसे कोई तो अग्नि बतलाते हैं तथा कोई मनु, कोई प्रजापति, कोई इन्द्र, कोई प्राण और कोई सनातन ब्रह्म कहते हैं” इत्यादि स्मृति भी है ॥ ३ ॥

तात्पर्य पढ़ें

स एष प्रज्ञानरूप आत्मा ब्रह्मापरं सर्वशरीरस्थः प्राणः प्रज्ञात्मा । अन्तःकरणोपाधिष्वनुप्रविष्टो जलभेदगतसूर्यप्रतिबिम्बवद्धिरण्यगर्भः प्राणः प्रज्ञात्मा । एष एव इन्द्रो गुणाद्देवराजो वा । एष प्रजापतिर्यः प्रथमजः शरीरी । यतो मुखादिनिर्भेदद्वारेणाग्न्यादयो लोकपाला जाताः स प्रजापतिरेष एव । येऽप्येतेऽग्न्यादयः सर्वे देवा एष एव ।

इमानि च सर्वशरीरोपादानभूतानि पञ्च पृथिव्यादीनि महाभूतान्यन्नान्नादत्वलक्षणान्येतानि किंचेमानि च क्षुद्रमिश्राणि क्षुद्रैरल्पकैर्मिश्राणि, इवशब्दोऽनर्थकः, सर्पादीनि बीजानि कारणानीतराणि चेतराणि च द्वैराश्येन निर्दिश्यमानानि ।

कानि तानि? उच्यन्ते—अण्डजानि पक्ष्यादीनि, जारुजानि जरायुजानि मनुष्यादीनि, स्वेदजादीनि यूकादीनि, उद्भिज्जानि च वृक्षादीनि, अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनोऽन्यच्च यत्किंचेदं प्राणिजातम्; किं तत्? जङ्गमं यच्चलति पद्भ्यां गच्छति । यच्च पतत्रि आकाशेन पतनशीलम् । यच्च स्थावरमचलम् । सर्वं तदेष एव । सर्वं तदशेषतः प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञप्तिः प्रज्ञा तच्च ब्रह्मैव । नीयतेऽनेनेति नेत्रम् प्रज्ञा नेत्रं यस्य तदिदं प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने ब्रह्मण्युत्पत्तिस्थितिलयकालेषु प्रतिष्ठितं प्रज्ञाश्रयमित्यर्थः । प्रज्ञानेत्रो लोकः पूर्ववत् । प्रज्ञाचक्षुर्वा सर्व एव लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा सर्वस्य जगतः । तस्मात्प्रज्ञानं ब्रह्म ।

तदेतत्प्रत्यस्तमितसर्वोपाधिविशेषं सन्निरञ्जनं निर्मलं निष्क्रियं शान्तमेकमद्वयं “नेति नेति” इति (बृ० उ० ३ ।९ ।२६) सर्वविशेषापोहसंवेद्यं सर्वशब्दप्रत्ययागोचरम् । तदत्यन्तविशुद्धप्रज्ञोपाधिसम्बन्धेन सर्वज्ञमीश्वरं सर्वसाधारणाव्याकृतजगद्बीजप्रवर्तकं नियन्तृत्वादन्तर्यामिसंज्ञं भवति । तदेव व्याकृतजगद्बीजभूतबुद्ध्यात्माभिमानलक्षणहिरण्यगर्भसंज्ञं भवति । तदेवान्तरण्डोद्भूतप्रथमशरीरोपाधिमद्विराट्प्रजापतिसंज्ञं भवति । तदुद्भूताग्न्याद्युपाधिमद्देवतासंज्ञं भवति । तथा विशेषशरीरोपाधिष्वपि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु तत्तन्नामरूपलाभो ब्रह्मणः । तदेवैकं सर्वोपाधिभेदभिन्नं सर्वैः प्राणिभिस्तार्किकैश्च सर्वप्रकारेण ज्ञायते विकल्प्यते चानेकधा । “एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रमेकेऽपरे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्” (मनु० १२ ।१२३) इत्याद्या स्मृतिः ॥ ३ ॥