स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत् ॥ ४ ॥
sa etena prajñenātmanāsmāllokādutkramyāmuṣminsvarge loke sarvān kāmānāptvāmṛtaḥ samabhavatsamabhavat .. 4 ..
वह (वामदेव) इस चैतन्यस्वरूप से ही इस लोक से उत्क्रमण कर इन्द्रियातीत स्वर्गलोक में सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्तकर अमर हो गया, [अमर] हो गया ॥ ४ ॥
इस प्रकार पूर्वोक्त ब्रह्म को जाननेवाला वह वामदेव अथवा कोई अन्य पुरुष चेतनात्मस्वरूप से, जिस चेतनात्मस्वरूप से पूर्ववर्ती विद्वान् अमरभाव को प्राप्त हुए थे उसी प्रकार यह विद्वान् भी इस चेतनात्मस्वरूप से ही इस लोक से उत्क्रमण कर—इत्यादि वाक्य की पहले (१ ।२ ।६ में) ही व्याख्या की जा चुकी है । अर्थात् इस लोक से उत्क्रमण कर इन्द्रियातीत स्वर्गलोक में सम्पूर्ण कामनाएँ पाकर अमर हो गया, [अमर] हो गया—इत्यलम् ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स वामदेवोऽन्यो वैवं यथोक्तं ब्रह्म वेद प्रज्ञेनात्मना; येनैव प्रज्ञेनात्मना पूर्वे विद्वांसोऽमृता अभूवंस्तथायमपि विद्वानेतेनैव प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्य इत्यादि व्याख्यातम् । अस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वा अमृतः समभवत्समभवदित्योमिति ॥ ४ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयेऽध्याये प्रथमः खण्डः समाप्तः ।
उपनिषत्क्रमेण तृतीयः, आरण्यकक्रमेण षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ।
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥