शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि ।
वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।
अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि ।
सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु ।
तद्वक्तारमवतु ।
अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।
अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि ।
सत्यं वदिष्यामि ।
तन्मामवतु ।
तद्वक्तारमवतु ।
अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
oṃ vāṅ me manasi pratiṣṭhitā mano me vāci pratiṣṭhitamāvirāvīrma edhi .
vedasya ma āṇīsthaḥ śrutaṃ me mā prahāsīḥ .
anenādhītenāhorātrānsandadhāmyṛtaṃ vadiṣyāmi .
satyaṃ vadiṣyāmi .
tanmāmavatu .
tadvaktāramavatu .
avatu māmavatu vaktāramavatu vaktāram ..
oṃ śāntiḥ! śāntiḥ!! śāntiḥ!!!
मेरी वागिन्द्रिय मन में स्थित हो और मन वाणी में स्थित हो [अर्थात् मेरी वागिन्द्रिय और मन एक-दूसरे के अनुकूल रहें] । हे स्वप्रकाश परमात्मन्! तुम मेरे समक्ष आविर्भूत होओ । [हे वाक् और मन! ] तुम मेरे प्रति वेद को लाओ । मेरा श्रवण किया हुआ मेरा परित्याग न करे । अपने इस अध्ययन के द्वारा मैं रात और दिन को एक कर दूँ [अर्थात् मेरा अध्ययन अहर्निश चलता रहे] । मैं ऋत (वाचिक सत्य)-का भाषण करूँ और सत्य (मन में निश्चय किया हुआ सत्य) बोलूँ । वह ब्रह्म मेरी रक्षा करे; वह वक्ता की रक्षा करे । वह मेरी रक्षा करे और वक्ता की रक्षा करे—वक्ता की रक्षा करे । त्रिविध ताप की शान्ति हो ।