ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
प्रथमोऽध्यायः
प्रथम खण्ड
शरच्चन्द्रनिभा भाति तं वन्दे नीलचिन्मणिम् ॥
manastāpatamaḥśāntyai yasya pādanakhacchaṭā .
śaraccandranibhā bhāti taṃ vande nīlacinmaṇim ..
सम्बन्धभाष्य
यहाँतक अपरब्रह्म (हिरण्यगर्भ) विषयक विज्ञान (उपासना)-के सहित कर्म का निरूपण समाप्त हुआ । उस ज्ञानसहित कर्म की परा गति का उक्थविज्ञान के द्वारा उपसंहार किया गया है । [उस उपसंहार का मूल के वाक्योंद्वारा प्रदर्शन कराते हैं—] “यह प्राणसंज्ञक सत्यब्रह्म है” “यह एक देव है” “सम्पूर्ण देव इस प्राण की ही विभूतियाँ हैं ।” “इस प्राण के तादात्म्य को प्राप्त होकर उपासक देवता में लीन हो जाता है”—ऐसा कहा गया । यह देवता में लय होना ही परम पुरुषार्थ है, यही मोक्ष है और वह यह (देवतालयरूप मोक्ष) इस ज्ञानकर्म-समुच्चयरूप यथोक्त साधन से ही प्राप्त होनेयोग्य है; इससे परे और कुछ नहीं है—ऐसा कुछ लोग समझते हैं । उन [समुच्चयवादियों के मत]-का निराकरण करने की इच्छासे श्रुति केवल आत्मविज्ञान का विधान करने के लिये ‘आत्मा वा इदम्’ इत्यादि ग्रन्थ का उल्लेख करती है ।
पूर्व०—परन्तु यह कैसे ज्ञात होता है कि आगे का ग्रन्थ कर्म के सम्बन्ध से रहित केवल आत्मज्ञान का ही विधान करने के लिये है?
सिद्धान्ती—क्योंकि इससे [ब्रह्मज्ञान के सिवा] किसी और अर्थ का ज्ञान नहीं होता । इसके सिवा श्रुति “उसे भूख और पिपासा से युक्त कर दिया” इत्यादि वाक्यों से उन अग्नि आदि पूर्वोक्त देवताओं को क्षुधा आदि दोषों से युक्त दिखलाते हुए उनका संसारित्व भी प्रदर्शित करेगी । परब्रह्म भूख-प्यास आदि से अतीत है—ऐसी श्रुति होने के कारण क्षुधा आदि से युक्त तो सब-का-सब संसार ही है ।
पूर्व०—इस प्रकार केवल आत्मज्ञान ही मोक्ष का साधन भले ही हो; परन्तु उसमें केवल कर्मत्यागी पुरुष का ही अधिकार नहीं है, क्योंकि इस विषय में कोई विशेष श्रुति नहीं है; अर्थात् किसी कर्मत्यागी आश्रमान्तर का यहाँ उल्लेख नहीं है । और बृहतीसहस्र नामक कर्म की अवतारणाकर उसके अनन्तर ही आत्मज्ञान का प्रारम्भ कर दिया है । अतः इसमें कर्मठ पुरुष का ही अधिकार है ।
इसके सिवा आत्मज्ञान कर्म से सर्वथा असम्बद्ध भी नहीं है, क्योंकि यहाँ भी अन्त में उसका पहलेही के समान उपसंहार किया गया है । जिस प्रकार ब्राह्मणमन्त्रने “सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च” इस वाक्यद्वारा सूर्य के आत्मभाव को प्राप्त हुए [सूर्य-मण्डलान्तर्वर्ती] कर्म-सम्बन्धी पुरुष को स्थावरजंगमादि सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मा बतलाया है उसी प्रकार श्रुति ‘एष ब्रह्मैष इन्द्रः’ इत्यादि मन्त्र से समस्त प्राणियों के आत्मस्वरूपत्व का उपक्रम कर उसका ‘यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्’ इत्यादि वाक्यद्वारा उपसंहार करेगी ।
इसी प्रकार संहितोपनिषद् में भी “इसी को बह्वृच (ऋग्वेदी) बृहती- सहस्र नामक सत्र में विचारते हैं” इत्यादि श्रुति से उसका कर्मसम्बन्धित्व प्रतिपादन कर “सम्पूर्ण भूतों में इसी को ‘ब्रह्मा’ ऐसा कहते हैं” इस प्रकार उपसंहार किया है । तथा “जो यह अशरीरी चेतन आत्मा है” इस प्रकार बतलाये हुए उस आत्मा का ही “जो यह सूर्य के अन्तर्गत है वह एक ही है—ऐसा जाने” इस वाक्यद्वारा एकत्व प्रतिपादन किया है । तथा यहाँ (इस उपनिषद् में) भी “यह आत्मा कौन है” इस प्रकार उपक्रम कर “प्रज्ञान ब्रह्म है” इस वाक्य से इसका प्रज्ञास्वरूपत्व ही प्रदर्शित करेंगे । अतः आत्मज्ञान कर्मत्याग से सम्बन्ध नहीं रखता ।
यदि कहो कि पुनरुक्ति होने के कारण तो यह प्रकरण व्यर्थ ही है; किस प्रकार [व्यर्थ है सो बतलाते हैं—] “हे ऋषे! मैं निश्चय प्राण ही हूँ” इत्यादि ब्राह्मण से तथा “सूर्य आत्मा है” इत्यादि मन्त्रद्वारा निश्चित किये आत्मा का “यह आत्मा कौन है” इस प्रकार प्रश्न कर के “[पहले] यह सब आत्मा ही [था]” इस प्रकार निश्चय करना पुनरुक्ति और निरर्थक ही है—यदि कोई ऐसा कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि उसी के किसी अन्य विशेष धर्म का निश्चय करने के लिये होने से इसमें पुनरुक्ति का दोष नहीं है ।
वह किस प्रकार दोषयुक्त नहीं है [सो बतलाते हैं—] उस कर्मसम्बन्धी आत्मा के ही जगत् की रचना, पालन और संहार आदि विशेष धर्मों का निर्धारण करने के लिये किंवा केवल उसकी उपासना के [निरूपण के] लिये [इस प्रकार की पुनरुक्ति सदोष नहीं है] अथवा यों समझो कि कर्म का निरूपण करते समय विधान न करने के कारण कर्मी आत्मा की उपासना कर्म को छोड़कर प्राप्त नहीं होती थी; अतः “आत्मा वा इदमग्रे” आदि ग्रन्थसमूह यह बतलाने के लिये ही है कि केवल आत्मा भी उपासनीय है । भेद और अभेदरूप से उपास्य होने के कारण एक ही आत्मा कर्म के विषय में भेददृष्टि से युक्त है और वही कर्म-दृष्टि को छोड़ देने के समय अभेदरूप से भी उपासनीय है—इस प्रकार यह अपुनरुक्ति ही है ।
“जो पुरुष विद्या (उपासना) और अविद्या (कर्म) इन दोनों को साथ-साथ जानता है वह अविद्या से मृत्यु को पार कर के विद्या से अमरत्व प्राप्त कर लेता है” तथा “इस लोक में कर्म करता हुआ ही सौ वर्षतक जीवित रहने की इच्छा करे”—ऐसा [ईशोपनिषद् में] वाजसनेयी शाखावालों का कथन है । मनुष्यों की परमायु भी सौ वर्ष से अधिक नहीं है, जिससे कि वह कर्मपरित्यागद्वारा आत्मा की उपासना कर स के । “पुरुष की आयु के इतने (छत्तीस) ही सहस्र दिन होते हैं” ऐसा [इस ऐतरेयारण्यक में ही] दिखलाया भी गया है । और वह सौ वर्ष की आयु कर्म से ही व्याप्त है; इसके लिये “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” इत्यादि मन्त्र पहले दिखलाया ही है ऐसा ही “यावज्जीवन अग्निहोत्र करता है” “जीवनपर्यन्त दर्शपूर्णमास से यजन करे” इत्यादि तथा [वृद्धावस्था में भी कर्मत्याग का निषेध सूचित करनेवाली] “उसको [मरने के अनन्तर] यज्ञपात्रों के सहित जलाते हैं” इत्यादि श्रुतियों से और ऋणत्रय की सूचना देनेवाली श्रुतियों से सिद्ध होता है । श्रुति में जो “[यतिजन] सर्वसंग-परित्याग कर के भिक्षाटन किया करते हैं” इत्यादि संन्याससम्बन्धी शास्त्र है वह आत्मज्ञान की स्तुति करनेवाला अर्थवाद है अथवा जि से कर्म का अधिकार नहीं है उसके लिये है ।
सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उस परमार्थ—आत्मतत्त्व का ज्ञान हो जानेपर क्रिया का कोई फल नहीं देखा जाता; इसलिये क्रिया नहीं हो सकती । तुमने जो कहा कि आत्मज्ञान कर्मी को ही होता है और वह कर्म से सम्बन्ध रखनेवाला है, सो ठीक नहीं । ‘सम्पूर्ण सांसारिक दोषों से रहित पूर्णकाम ब्रह्म मैं हूँ’ इस प्रकार ब्रह्म का आत्मभाव से ज्ञान हो जानेपर कर्म-फल को न देखने के कारण कृत अथवा कर्तव्य से अपना कोई प्रयोजन न देखनेवाले पुरुष से कोई क्रिया नहीं हो सकती ।
यदि कहो कि फल दिखायी न देनेपर भी शास्त्राज्ञा होने के कारण वह कर्म करता ही है तो ऐसा कहना उचित नहीं; क्योंकि वह शास्त्राज्ञा के अविषयभूत आत्मा का दर्शन कर लेता है । जो पुरुष अपना इष्टप्राप्ति और अनिष्ट परिहाररूप प्रयोजन देखकर उसके उपाय का अर्थी होता है, लोक में वही [विधि निषेधरूप] नियोग का विषय होता देखा गया है; उसके विपरीत नियोग के अविषयभूत ब्रह्म में आत्मत्व का दर्शन करनेवाला पुरुष नियोग का विषय होता नहीं देखा जाता ।
यदि ब्रह्मात्मत्व-दर्शन करनेवाला पुरुष नियोग का अविषय होनेपर भी शास्त्र से नियुक्त हो तो कोई नियुक्त न होनेवाला तो रहा ही नहीं । इससे यही प्राप्त होता है कि सब को सर्वदा सम्पूर्ण कर्म करते रहना चाहिये । किन्तु यह अभीष्ट नहीं है । वह (आत्मदर्शी) तो किसी से भी नियोजित नहीं हो सकता, क्योंकि शास्त्र भी उसी से उत्पन्न हुआ है । अपने विज्ञान से उत्पन्न हुए वचन से ही कोई स्वयं नियुक्त नहीं हो सकता और न बहुज्ञ स्वामी ही अपने अल्पज्ञ सेवक से नियुक्त हो सकता है ।
यदि कहो कि नित्य होने के कारण वेद का नियोक्तृत्वसामर्थ्य स्वतन्त्रतापूर्वक सब के प्रति है, तो उपर्युक्त दोष के कारण ऐसा कहना ठीक नहीं । ऐसी अवस्था में भी ‘सब को सब कर्म अविशेषरूप से करने चाहिये’—यह ऊपर बतलाया हुआ दोष अपरिहार्य ही रहता है ।
यदि कहो कि उसका विधान भी शास्त्रने ही किया है अर्थात् जिस प्रकार शास्त्रने कर्म की कर्तव्यता बतलायी है उसी प्रकार उस कर्मी के लिये ही उस आत्मज्ञान का भी शास्त्रने ही विधान किया है तो ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि उसका विरुद्ध अर्थबोधकत्व सम्भव नही है । अग्नि की शीतलता और उष्णता के समान एक ही शास्त्र में पाप-पुण्य के सम्बन्धित्व और उसके विपरीतत्व का बोध कराना—[ये दोनों विरुद्धधर्म] सम्भव नहीं हैं ।
इसके सिवा अपनी इष्टवस्तु के संयोग की इच्छा तथा अनिष्ट पदार्थ के परित्याग की अभिलाषा भी शास्त्रजनित नहीं है; क्योंकि यह सभी प्राणियों में [स्वभाव से ही] देखी जाती है । यदि शास्त्रजनित होतीं तो ये दोनों इच्छाएँ ग्वाले आदि में दिखायी न देतीं; क्योंकि वे अशास्त्रज्ञ होते हैं । जो वस्तु स्वतः प्राप्त नहीं होती वही शास्त्रद्वारा बोद्धव्य होती है । इस प्रकार यदि शास्त्रने कृत और कर्तव्यता के विरोधी आत्मज्ञान का उपदेश किया है तो फिर वह अग्नि में शीतलता के समान तथा सूर्य में अन्धकार के समान उसकी विरुद्ध कर्तव्यता को किस प्रकार उत्पन्न करेगा?
यदि कहो कि वह ऐसा बोध कराता ही नहीं है तो ऐसा कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि “वह मेरा आत्मा है—ऐसा जाने” तथा “प्रज्ञान ही ब्रह्म है” इस प्रकार उपसंहार किया गया है, तथा “उस (जीवरूप से अवस्थित ब्रह्म)-ने अपने को ही जाना” “वह तू ही है” इत्यादि वाक्य भी आत्मज्ञानपरक ही हैं । उत्पन्न हुआ ब्रह्मात्मविज्ञान भी बाधित होनेयोग्य न होने के कारण अनुत्पन्न या भ्रान्तिजनित नहीं कहा जा सकता ।
यदि कहो कि “उसे इस लोक में अकृत (कर्मत्याग)-से भी कोई प्रयोजन नहीं है” इस स्मृति के अनुसार बोधवान् को त्याग करने में भी प्रयोजनाभाव की समानता ही है; अर्थात् जो लोग कहते हैं कि ब्रह्म को जानकर व्युत्थान (कर्मत्याग) ही करना चाहिये उनके लिये भी यह प्रयोजनाभावरूप दोष समान ही है, तो उनका यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि व्युत्थान तो अक्रिया ही है । प्रयोजन का भाव तो अविद्या के कारण रहता है । वह वस्तु का धर्म नहीं है, क्योंकि यह बात सभी प्राणियों में देखी जाती है; अर्थात् प्रयोजन की तृष्णा से प्रेरित होते हुए प्राणियों की वाणी, मन और शरीर द्वारा प्रवृत्ति होती देखी गयी है तथा वाजसनेयी ब्राह्मण में भी “उस (आदिपुरुष)-ने इच्छा की कि मेरे पत्नी हो” इत्यादि कथन के द्वारा “ये दोनों (साध्य-साधनरूप) एषणाएँ ही हैं” इस निश्चय के अनुसार यही ज्ञात होता है कि पुत्र-वित्तादि पांक्तलक्षण कर्म काम्य ही है ।
अतः विद्वान् के अविद्या आदि दोषों का अभाव हो जाने के कारण अविद्या एवं कामनारूप दोष से होनेवाली मन, वाणी और शरीर की पांक्तरूपा प्रवृत्ति उपपन्न नहीं है; इसलिये व्युत्थान क्रिया का अभावमात्र है, वह यागादि के समान अनुष्ठेयरूप और भावात्मक नहीं है । वह तो विद्यावान् पुरुष का धर्म ही है; अतः उसके लिये किसी प्रयोजन का अन्वेषण करने की आवश्यकता नहीं है । अन्धकार में प्रवृत्त होनेवाला पुरुष यदि प्रकाश के उदित होनेपर गड्ढे, कीचड़ और काँटे आदि में नहीं गिरता तो ‘इस (उसके न गिरने)-का क्या प्रयोजन है? ऐसा प्रश्न नहीं किया जा सकता ।
तब तो स्वभावतः प्राप्त होने के कारण व्युत्थान चोदना (विधिवाक्य)-का विषय नहीं है । इसपर यदि कहो कि यदि किसी को गृहस्थाश्रम में ही परब्रह्म का ज्ञान हो जाय तो उसे उस आश्रम में ही कुछ न करते हुए बैठा रहना चाहिये, वहाँ से कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहिये, तो ऐसा कहना उचित नहीं; क्योंकि “इतनी ही कामना है” “ये दोनों एषणाएँ ही हैं” इत्यादि वाक्यों से निश्चित किया जाने के कारण गृहस्थाश्रम तो कामना से ही प्रयुक्त है । कामना के निमित्तभूत पुत्र-वित्तादि के सम्बन्ध के नियम का अभावमात्र ही ‘व्युत्थान’ है; उनके पास से कहीं अन्यत्र चला जाना ‘व्युत्थान’ नहीं कहा जाता । अतः जिसे ज्ञान उत्पन्न हुआ है उसके लिये कुछ न करते हुए गृहस्थाश्रम में ही स्थित रहना सम्भव नहीं है । इससे विद्वान् के लिये गुरुशुश्रूषा और तपस्या की भी अनुपपत्ति सिद्ध होती है ।
इस विषय में कोई-कोई गृहस्थ पुरुष भिक्षाटनादि के भय और तिरस्कार से डरने के कारण अपनी सूक्ष्मदर्शिता प्रकट करते हुए उत्तर देते हैं—‘केवल देहधारणमात्र के इच्छुक भिक्षु के लिये भी भिक्षाटनादि का नियम देखा जाता है; अतः [पुत्र-वित्तादि] साध्य और [कर्म-उपासना आदि] साधन दोनों की एषणाओं से मुक्त हुए केवल देहधारण के लिये भोजनाच्छादनमात्र से निर्वाह करनेवाले गृहस्थ को भी घरही में रहना चाहिये ।
परन्तु उनका ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि अपने गृहविशेष के परिग्रह का नियम कामनाप्रयुक्त ही है—इस प्रकार इसका उत्तर पहले दिया ही जा चुका है । और अपने गृहविशेष के परिग्रह का अभाव होनेपर तो केवल शरीरधारणमात्र के लिये भोजनाच्छादन की इच्छा करनेवाले पुरुष को अपने परिग्रह विशेष का अभाव होने के कारण स्वतः भिक्षुकत्व ही प्राप्त हो जाता है ।
जिस प्रकार भिक्षु के लिये शरीररक्षा में उपयोगी भिक्षाटनादि की प्रवृत्ति एवं शौचादि का नियम है उसी प्रकार विद्वान् और निष्काम गृहस्थ को भी ‘यावज्जीवादि’ श्रुति से नियुक्त होने के कारण प्रत्यवाय की निवृत्ति के लिये नित्यकर्मों में नियम से प्रवृत्ति हो सकती है [ऐसा यदि कोई कहे तो] इस कथन का तो पहले ही प्रतिवाद किया जा चुका है; क्योंकि नियोग का अविषय होने के कारण विद्वान् नियुक्त नहीं किया जा सकता ।
पूर्व०—तब तो ‘यावज्जीवन अग्निहोत्र करे’ इत्यादि नित्य विधि की व्यर्थता ही सिद्ध होती है ।
सिद्धान्ती—नहीं, अविद्वान्विषयक होने के कारण वह सार्थक है । केवल शरीरधारणमात्र के लिये भिक्षाटनादि में प्रवृत्त हुए यति की प्रवृत्ति का जो नियतत्व है वह प्रवृत्ति का प्रयोजक नहीं है । आचमन में प्रवृत्त हुए पुरुष की पिपासानिवृत्ति के समान उसके भिक्षाटनादि का [क्षुधानिवृत्ति आदि के सिवा] कोई अन्य प्रयोजन नहीं समझा जाता । परन्तु इसके समान अग्निहोत्रादि कर्मों का स्वतःप्राप्त प्रवृत्ति को नियत करना नहीं माना जा सकता ।
पूर्व०—परन्तु प्रयोजन का अभाव हो जानेपर तो स्वतःप्राप्त प्रवृत्ति का नियम भी व्यर्थ ही है?
सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि यह [भिक्षाटनादि का] नियम पूर्वप्रवृत्ति से सिद्ध होने के कारण उसके उल्लंघन में अधिक प्रयत्न की आवश्यकता है । और स्वभावतः प्राप्त व्युत्थान का [“व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति” आदि वाक्यों से] पुनः विधान किया गया है, इसलिये विद्वान् मुमुक्षु के लिये उसकी कर्तव्यता उचित ही है । जिस मुमुक्षु को ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है उसे भी संन्यास करना ही चाहिये । इस विषय में “शान्तो दान्त उपरत-स्तितिक्षुः” आदि वचन प्रमाण हैं । तथा आत्मदर्शन के साधन शमदमादि का अन्य आश्रमों में होना सम्भव भी नहीं है, जैसा कि “मन्त्रद्रष्टा ऋषियों द्वारा भली प्रकार सेवित उस परम पवित्र तत्त्व का परमहंसों को उपदेश किया” इत्यादि मन्त्रों से श्वेताश्वतरोपनिषद् में बतलाया गया है, तथा “कर्म से, प्रजा से अथवा धन से नहीं बल्कि त्याग से ही किन्हीं-किन्हीं ने अमरत्व प्राप्त किया है” ऐसी कैवल्योपनिषद् की श्रुति भी है । और “ज्ञान प्राप्तकर नैष्कर्म्य का आचरण करे” इस स्मृति से भी यही सिद्ध होता है । “ब्रह्माश्रमपदे वसेत्” इस स्मृति के अनुसार ज्ञानप्राप्ति के साधन ब्रह्मचर्यादि की सिद्धि भी सम्यक्-रीति से संन्यासियों में ही हो सकती है; क्योंकि गृहस्थाश्रम में उन साधनों का होना असम्भव है; और अपूर्ण साधन किसी अर्थ को सिद्ध करने में समर्थ नहीं है । गृहस्थाश्रम के कर्म जिस विज्ञान में उपयोगी हैं उसके देवता में लय होनारूप संसारविषयक परम फल का उपसंहार किया जा चुका है । यदि कर्मी को ही परमात्मा का साक्षात् ज्ञान हुआ करता तो संसारविषयक फल का उपसंहार (अन्त) होना कभी सम्भव ही न था ।
यदि कहो कि वह तो अंगफलमात्र है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्मविद्या तो उसके विरोधी आत्मतत्त्व से सम्बन्ध रखनेवाली है । सब प्रकार के नाम, रूप और कर्म से रहित परमार्थ आत्मतत्त्व से सम्बन्ध रखनेवाला आत्मज्ञान तो अमरत्व का साधन है । उससे गौण फल का सम्बन्ध माननेपर तो ज्ञान का सर्वविशेषशून्य आत्मवस्तु से सम्बन्धित होना ही सिद्ध नहीं होता । और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि “जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो गया है” इस प्रकार आरम्भ करके विद्वान् के लिये क्रिया, कारक और फल आदि सम्पूर्ण व्यवहार का निराकरण किया है । तथा उसके विपरीत अविद्वान् के लिये वाजसनेयिब्राह्मण में “जहाँ कि द्वैत के समान होता है” ऐसा कहकर क्रिया, कारक और फलरूप संसारविषय को प्रदर्शित किया है । इसी प्रकार यहाँ (ऐतरेयोपनिषद् में) भी जो क्षुधा-पिपासादियुक्त वस्तुरूप संसारविषयक देवतालयसंज्ञक फल है उसका उपसंहार कर अब केवल सर्वात्मक वस्तुविषयक ज्ञान का ही अमरत्व-प्राप्ति के लिये वर्णन करूँगी—ऐसे अभिप्राय से श्रुति प्रवृत्त होती है ।
तथा देवलोक, पितृलोक और मनुष्यलोक की प्राप्ति में ऋणों का प्रतिबन्ध तो अज्ञानी के ही लिये है, ज्ञानी के लिये नहीं, जैसा कि “उस इस मनुष्य-लोक को पुत्र के द्वारा ही [जीता जा सकता है]” इत्यादि लोकत्रय की प्राप्ति के साधन का नियम करनेवाली श्रुति से सिद्ध होता है । तथा आत्मलोक के इच्छुक विद्वान् के लिये “हम प्रजा से क्या करेंगे? ” इत्यादि वाक्यों द्वारा ऋणों के प्रतिबन्ध का अभाव दिखलाया है, इसी प्रकार “वे प्रसिद्ध आत्मवेत्ता कावषेय ऋषि बोले—[मैं अध्ययन कैसे करूँ? होम कैसे करूँ? ]” इत्यादि श्रुति है तथा ऐसी ही “उस इस आत्मतत्त्व को जाननेवाले पूर्ववर्ती विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते थे ।” यह कौषीतकी शाखा की श्रुति है ।
पूर्व०—तब अविद्वान् के लिये तो ऋणों का परिशोध बिना किये संन्यास करना बन नहीं सकता?
सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थाश्रम की प्राप्ति से पूर्व तो ऋणित्व ही असम्भव है । यदि अधिकारारूढ न हुआ पुरुष भी ऋणी हो सकता है तो सभी का ऋणी होना सिद्ध होगा और इस प्रकार बड़ा अनिष्ट प्राप्त होगा । जो गृहस्थाश्रम को प्राप्त हो गया है उस पुरुष के लिये भी “गृहस्थाश्रम से वानप्रस्थ होकर संन्यास करे अथवा [इस क्रम को छोड़कर] अन्य प्रकार से यानी ब्रह्मचर्य से, गृहस्थाश्रम से अथवा वानप्रस्थाश्रम से ही संन्यास कर दे” इत्यादि श्रुतियों द्वारा आत्मदर्शन के साधन के उपायरूप से संन्यास प्राप्त हो ही जाता है । अविद्वान् और अमुमुक्षु पुरुषों के विषय में “यावज्जीवन अग्निहोत्र करे” इत्यादि श्रुतियों की भी कृतार्थता है । छान्दोग्य में तो किन्हीं-किन्हीं के लिये बारह रात्रि अग्निहोत्र करके तदनन्तर उसका परित्याग करना सुना जाता है ।
और तुमने जो कहा कि जिन्हें कर्म का अधिकार नहीं है उन्हीं के लिये संन्यास का विधान है, सो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उनके विषय में “उत्सन्नाग्निरनग्निको वा” इत्यादि अलग ही श्रुति है । तथा समस्त स्मृतियों में भी आश्रमों का विकल्प और समुच्चय सामान्यरूप से प्रसिद्ध ही है ।
तथा यह जो कहा कि विद्वान् को जो कर्मत्याग की स्वतः प्राप्ति बतलायी है, सो शास्त्र का विषय न होने के कारण उसके घर या वन में रहने में कोई विशेषता नहीं है; ऐसा कहना ठीक नहीं । व्युत्थान के स्वतः प्राप्त होने के कारण ही उसकी अन्यत्र [यानी गृहस्थाश्रम में] स्थिति नहीं हो सकती । अन्यत्र स्थिति को तो हमने कामना और कर्म से प्रेरित ही बतलाया है; और उसके अभाव को ही व्युत्थान कहा है ।
स्वेच्छाचार तो अत्यन्त मूढ का विषय समझा गया है, इसलिये विद्वान् के लिये वह अत्यन्त अप्राप्त है । तथा विद्वान् के लिये तो अत्यन्त भाररूप होने के कारण शास्त्रोक्त कर्म की भी अप्राप्ति समझी जाती है । फिर अत्यन्त अविवेक के कारण होनेवाले स्वेच्छाचार की तो बात ही क्या है? उन्माद अथवा तिमिररोग से दूषित दृष्टिद्वारा उपलब्ध हुई वस्तु उसके निवृत्त हो जानेपर भी वैसी ही नहीं रहती; क्योंकि वह तो उन्माद अथवा तिमिरदृष्टि के कारण ही वैसी प्रतीत होती है । अतः यह सिद्ध हुआ कि आत्मवेत्ता के लिये व्युत्थान को छोड़कर न तो स्वेच्छाचार ही है और न कोई अन्य कर्तव्य ही शेष रहता है ।
तथा ऐसा जो कहा है कि “जो पुरुष विद्या और अविद्या दोनोंको साथ-साथ जानता है” वह इसलिये नहीं है कि विद्वान्में विद्याके साथ अविद्या भी रहती है । तो फिर उसका क्या प्रयोजन है? उसका तात्पर्य तो यही है कि एक ही पुरुषमें ये दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते; जिस प्रकार कि सीपीमें एक पुरुषको [एक ही समय] चाँदी और सीपी दोनोंका ज्ञान नहीं हो सकता । कठोपनिषद्में भी कहा है— “जो विद्या और अविद्या नामसे जानी जाती हैं वे परस्पर अत्यन्त विपरीत (विरुद्ध स्वभाववाली) हैं ।” अतः विद्याके रहते हुए अविद्याका रहना किसी प्रकार सम्भव नहीं है ।
“तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर” इत्यादि श्रुतिके अनुसार तप आदि विद्योत्पत्तिके साधन और गुरुकी उपासना आदि कर्म अविद्यामय होनेके कारण ‘अविद्या’ कहे जाते हैं । उस अविद्यारूप कर्मसे विद्याको उत्पन्न करके वह मृत्यु यानी कामनाको पार कर जाता है । तब वह निष्काम और एषणामुक्त पुरुष ब्रह्मविद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है—इसी अर्थको प्रदर्शित करते हुए कहते हैं कि “अविद्यासे मृत्युको पारकर विद्यासे अमरत्व प्राप्त कर लेता है ।”
“कर्म करते हुए ही सौ वर्षतक जीवित रहनेकी इच्छा करे” इस मन्त्रद्वारा जो यह कहा गया था कि पुरुषकी सारी आयु कर्मसे ही व्याप्त है उसका ‘वह अविद्वान्से सम्बन्ध रखनेवाला है’— ऐसा बतलाकर खण्डन कर दिया गया, क्योंकि अन्य प्रकार वैसा होना असम्भव है तथा तुमने जो कहा था कि आगे कहा जानेवाला आत्मज्ञान भी पूर्वोक्त [श्रुतिकथित] ज्ञानके तुल्य होनेके कारण कर्मसे अविरुद्ध ही है उस कथनको भी सविशेष और निर्विशेष आत्मविषयक बतलाकर खण्डन कर चुके हैं और आगेकी व्याख्यामें इसका दिग्दर्शन भी करायेंगे । अब यहाँसे केवल निष्क्रिय ब्रह्म और आत्माकी एकताका ज्ञान प्रदर्शित करनेके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
परिसमाप्तं कर्म सहापरब्रह्मग्रन्थस्य विषयविज्ञानेन । सैषा प्रयोजनम् कर्मणो ज्ञानसहितस्य परा गतिरुक्थविज्ञानद्वारेणोपसंहिता । “एतत्सत्यं ब्रह्म प्राणाख्यम्” “एष एको देवः” “एतस्यैव प्राणस्य सर्वे देवा विभूतयः” “एतस्य प्राणस्यात्मभावं गच्छन्देवता अप्येति” इत्युक्तम् । सोऽयं देवताप्ययलक्षणः परः पुरुषार्थः, एष मोक्षः । स चायं यथोक्तेन ज्ञानकर्मसमुच्चयसाधनेन प्राप्तव्यो नातः परमस्तीत्येके प्रतिपन्नाः । तान्निराचिकीर्षुरुत्तरं केवलात्मज्ञानविधानार्थम् ‘आत्मा वा इदम्’ इत्याद्याह ।
कथं पुनरकर्मसम्बन्धिकेवलात्मप्रतिपाद्य- विज्ञानविधानार्थ विचारः उत्तरो ग्रन्थ इति गम्यते?
अन्यार्थानवगमात् । तथा च पूर्वोक्तानां देवतानामग्न्यादीनां संसारित्वं दर्शयिष्यत्यशनायादिदोषवत्त्वेन “तमशनापिपासाभ्यामन्ववार्जत्” (१ । २ । १) इत्यादिना । अशनायादिमत्सर्वं संसार एव; परस्य तु ब्रह्मणोऽशनायाद्यत्ययश्रुतेः ।
भवत्वेवं केवलात्मज्ञानं समुच्चयवादिन मोक्षसाधनं न आक्षेपः त्वत्राकर्म्येवाधिक्रियते, विशेषाश्रवणात् । अकर्मिण आश्रम्यन्तरस्येहाश्रवणात् । कर्म च बृहतीसहस्रलक्षणं प्रस्तुत्यानन्तरमेवात्मज्ञानं प्रारभ्यते । तस्मात् कर्मेवाधिक्रियते ।
न च कर्मासम्बन्ध्यात्मविज्ञानं पूर्ववदन्त उपसंहारात् । यथा कर्मसम्बन्धिनः पुरुषस्य सूर्यात्मनः स्थावरजङ्गमादिसर्वप्राण्यात्मत्वमुक्तं ब्राह्मणेन मन्त्रेण च “सूर्य आत्मा” (ऋ० सं० १ ।११५ ।१) इत्यादिना, तथैव ‘एष ब्रह्मैष इन्द्रः’ (३ । १ । ३) इत्याद्युपक्रम्य सर्वप्राण्यात्मत्वम् ‘यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् (३ ।१ ।३) इत्युपसंहरिष्यति ।
तथा च संहितोपनिषदि “एतं ह्येव बह्वृच महत्युक्थे मीमांसन्ते” (ऐ० आ० ३ ।२ ।३ ।१२) इत्यादिना कर्मसम्बन्धित्वमुक्त्वा “सर्वेषु भूतेष्वेतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते” इत्युपसंहरति । तथा तस्यैव “योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा” इत्युक्तस्य “यश्चासावादित्य एकमेव तदिति विद्यात्” इत्येकत्वमुक्तम् । इहापि “कोऽयमात्मा” (३ ।१ ।१) इत्युपक्रम्य प्रज्ञात्मत्वमेव “प्रज्ञानं ब्रह्म” (३ । १ । ३) इति दर्शयिष्यति । तस्मान्नाकर्मसम्बन्ध्यात्मज्ञानम् ।
पुनरुक्त्यानर्थक्यमिति चेत् । कथम्? “प्राणो वा अहमस्म्यृषे” इत्यादिब्राह्मणेन “सूर्य आत्मा” इति मन्त्रेण च निर्धारितस्यात्मनः “आत्मा वा इदम्” इत्यादिब्राह्मणेन “कोऽयमात्मा” (३ । १ ।१) इति प्रश्नपूर्वकं पुनर्निर्धारणं पुनरुक्तमनर्थकमिति चेत्, न; तस्यैव धर्मान्तरविशेषनिर्धारणार्थत्वान्न पुनरुक्ततादोषः ।
कथम्? तस्यैव कर्मसम्बन्धिनो जगत्सृष्टिस्थितिसंहारादिधर्मविशेषनिर्धारणार्थत्वात् केवलोपास्यर्थत्वाद्वा । अथवा आत्मेत्यादिपरो ग्रन्थसन्दर्भ आत्मनः कर्मिणः कर्मणोऽन्यत्रोपासनाप्राप्तौ कर्मप्रस्तावेऽविहितत्वात्केवलोऽप्यात्मोपास्य इत्येवमर्थः । भेदाभेदोपास्यत्वाद्दैक एवात्मा कर्मविषये भेददृष्टिभाक्, स एवाकर्मकालेऽभेदेनाप्युपास्य इत्येवमपुनरुक्तता ।
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयँसह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते” (ई० उ० ११) इति, “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँसमाः” (ई० उ० २) इति च वाजिनाम् । न च वर्षशतात्परमायुर्मर्त्यानाम् । येन कर्मपरित्यागेनात्मानमुपासीत । दर्शितं च “तावन्ति पुरुषायुषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति” इति । वर्षशतं चायुः कर्मणैव व्याप्तम् । दर्शितश्च मन्त्रः “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” इत्यादिः । तथा “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति” “यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत” इत्याद्याश्च । “तं यज्ञपात्रैर्दहन्ति” इति च । ऋणत्रयश्रुतेश्च । तत्र पारिव्राज्यादि शास्त्रं “व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति” (बृ० उ० ३ । ५ । १, ४ । ४ । २२) इति आत्मज्ञानस्तुतिपरोऽर्थवादः । अनधिकृतार्थो वा ।
न; परमार्थविज्ञाने फलादर्शने आक्षेपनिरासः क्रियानुपपत्तेः । यदुक्तं कर्मिण आत्मज्ञानं कर्मसम्बन्धि च इत्यादि तन्न । परं ह्याप्तकामं सर्वसंसारदोषवर्जितं ब्रह्माहमस्मीत्यात्मत्वेन विज्ञाने, कृतेन कर्तव्येन वा प्रयोजनमात्मनोऽपश्यतः फलादर्शने क्रिया नोपपद्यते ।
फलादर्शनेऽपि नियुक्तत्वात्करोतीति चेन्न आत्मदर्शिनो नियोगाविषयात्मनियोगाविषयत्वम् दर्शनात् । इष्टयोगमनिष्टवियोगं चात्मनः प्रयोजनं पश्यंस्तदुपायार्थी यो भवति स नियोगस्य विषयो दृष्टो लोके । न तु तद्विपरीतनियोगाविषयब्रह्मात्मत्वदर्शी ।
ब्रह्मात्मत्वदर्श्यपि संश्चेन्नियुज्येत नियोगाविषयोऽपि सन् कश्चिन्न नियुक्त इति सर्वं कर्म सर्वेण सर्वदा कर्तव्यं प्राप्नोति । तच्चानिष्टम् । न च स नियोक्तुं शक्यते केनचित्; आम्नायस्यापि तत्प्रभवत्वात् । न हि स्वविज्ञानोत्थेन वचसा स्वयं नियुज्यते । नापि बहुवित्स्वाम्यविवेकिना भृत्येन ।
आम्नायस्य नित्यत्वे सति स्वातन्त्र्यात्सर्वान्प्रति नियोक्तृत्वसामर्थ्यमिति चेन्न उक्तदोषात् । तथापि सर्वेण सर्वदा सर्वमविशिष्टं कर्म कर्तव्यमित्युक्तो दोषोऽप्यपरिहार्य एव ।
तदपि शास्त्रेणैव विधीयत इति शास्त्रस्य चेद् यथा विरुद्धार्थकर्मकर्तव्यता बोधकत्वानुपपत्तिः शास्त्रेण कृता तथा तदप्यात्मज्ञानं तस्यैव कर्मिणः शास्त्रेण विधीयत इति चेत्, न; विरुद्धार्थबोधकत्वानुपपत्तेः । न ह्येकस्मिन्कृताकृतसम्बन्धित्वं तद्विपरीतत्वं च बोधयितुं शक्यम्, शीतोष्णतामिवाग्नेः ।
न चेष्टयोगचिकीर्षा आत्मनोसिद्धवस्तुनःऽनिष्टवियोगचिकीर्षा शास्त्राबोध्यत्वम् च शास्त्रकृता, सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । शास्त्रकृतं चेत्तदुभयं गोपालादीनां न दृश्येत, अशास्त्रज्ञत्वात्तेषाम् । यद्धि स्वतोऽप्राप्तं तच्छास्त्रेण बोधयितव्यम् । तच्चेत्कृतकर्तव्यताविरोध्यात्मज्ञानं शास्त्रेण कृतम्, कथं तद्विरुद्धां कर्तव्यतां पुनरुत्पादयेच्छीततामिवाग्नौ तम इव च भानौ ।
न बोधयत्येवेति चेन्न, “स म आत्मेति विद्यात्” (कौ० उ० ३ ।९) “प्रज्ञानं ब्रह्म” (३ ।१ ।३) इति चोपसंहारात् ।
“तदात्मानमेवावेत्” (बृ० उ० १ । ४ । १०) “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६ । ८—१६) इत्येवमादिवाक्यानां तत्परत्वात् । उत्पन्नस्य च ब्रह्मात्मविज्ञानस्याबाध्यमानत्वान्नानुत्पन्नं भ्रान्तं वेति शक्यं वक्तुम् ।
त्यागेऽपि प्रयोजनाभावस्य प्रयोजनाभावे तुल्यत्वमिति चेत् संन्यासस्य “नाकृतेनेह कश्चन” स्वतःसिद्धत्वम् (गीता ३ । १८) इति स्मृतेः, य आहुर्विदित्वा ब्रह्मा व्युत्थानमेव कुर्यादिति तेषामप्येष समानो दोषः प्रयोजनाभाव इति चेन्न; अक्रियामात्रत्वाद् व्युत्थानस्य । अविद्यानिमित्तो हि प्रयोजनस्य भावो न वस्तुधर्मः सर्वप्राणिनां तद्दर्शनात् । प्रयोजनतृष्णया च प्रेर्यमाणस्य वाङ्मनःकायैः प्रवृत्तिदर्शनात् । “सोऽकामयत जाया मे स्यात्” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इत्यादिना पुत्रवित्तादि पाङ्क्तलक्षणं काम्यमेवेति “उभे ह्येते एषणे एव” (बृ० उ० ३ । ५ । १; ४ । ४ । २२) इति वाजसनेयिब्राह्मणेऽवधारणात् ।
अविद्याकामदोषनिमित्ताया वाङ्मनःकायप्रवृत्तेः पाङ्क्तलक्षणाया विदुषोऽविद्यादिदोषाभावादनुपपत्तेः क्रियाभावमात्रं व्युत्थानम्, न तु यागादिवदनुष्ठेयरूपं भावात्मकम् । तच्च विद्यावत्पुरुषधर्म इति न प्रयोजनमन्वेष्टव्यम् । न हि तमसि प्रवृत्तस्योदित आलोके यद्गर्तपङ्ककण्टकाद्यपतनं तत्किं प्रयोजनमिति प्रश्नार्हम् ।
व्युत्थानं तर्ह्यर्थप्राप्तत्वान्न कामाभावे चोदनार्हमिति आत्मज्ञस्यापि गार्हस्थ्ये चेत्परं गार्हस्थ्यानुपपत्तिः ब्रह्मविज्ञानं जातं तत्रैवास्त्वकुर्वत आसनं न ततोऽन्यत्र गमनमिति चेन्न, कामप्रयुक्तत्वाद्गार्हस्थ्यस्य; “एतावान्वै कामः” (बृ० उ० १ । ४ । १७) इति “उभे ह्येते एषणे एव” (बृ० उ० ३ । ५ । १; ४ । ४ । २२) इत्यवधारणात् । कामनिमित्तपुत्रवित्तादिसम्बन्धनियमाभावमात्रं न हि ततोऽन्यत्र गमनं व्युत्थानमुच्यते । अतो न गार्हस्थ्य एवाकुर्वत आसनमुत्पन्नविद्यस्य । एतेन गुरुशुश्रूषातपसोरप्यप्रतिपत्तिर्विदुषः सिद्धा ।
अत्र केचिद् गृहस्था गृहस्थानामाक्षेपः भिक्षाटनादिभयात्परिभवाच्च त्रस्यमानाः सूक्ष्मदृष्टितां दर्शयन्त उत्तरमाहुः, भिक्षोरपि भिक्षाटनादिनियमदर्शनाद्देहधारणमात्रार्थिनो गृहस्थस्यापि साध्यसाधनैषणोभयविनिर्मुक्तस्य देहमात्रधारणार्थमशनाच्छादनमात्रमुपजीवतो गृह एवास्वासनमिति ।
न, स्वगृहविशेषपरिग्रहनियमस्य तस्य निरासः कामप्रयुक्तत्वादित्युक्तोत्तरमेतत् । स्वगृहविशेषपरिग्रहाभावे च शरीरधारणमात्रप्रयुक्ताशनाच्छादनार्थिनः स्वपरिग्रहविशेषाभावेऽर्थाद्भिक्षुकत्वमेव ।
शरीरधारणार्थायां भिक्षाटनादिविद्वन्न्यास- प्रवृत्तौ यथा विचारः नियमो भिक्षोः शौचादौ च, तथा गृहिणोऽपि विदुषोऽकामिनोऽस्तु नित्यकर्मसु नियमेन प्रवृत्तिर्यावज्जीवादिश्रुतिनियुक्तत्वात् प्रत्यवायपरिहारायेति । एतन्नियोगाविषयत्वेन विदुषः प्रत्युक्तमशक्यनियोज्यत्वाच्चेति ।
यावज्जीवादिनित्यचोदनानर्थक्यमिति चेत्?
न, अविद्वद्विषयत्वेनार्थवत्त्वात् । यत्तु भिक्षोः शरीरधारण- मात्रप्रवृत्तस्य प्रवृत्तेर्नियतत्वं तत्प्रवृत्तेर्न प्रयोजकम् । आचमनेप्रवृत्तस्य पिपासापगमवन्नान्यप्रयोजनार्थत्वमवगम्यते । न चाग्निहोत्रादीनां तद्वदर्थप्राप्तप्रवृत्तिनियतत्वोपपत्तिः ।
अर्थप्राप्तप्रवृत्तिनियमोऽपि प्रयोजनाभावेऽनुपपन्न एवेति चेत्?
न, तन्नियमस्य पूर्वप्रवृत्तिसिद्धत्वात्तदतिक्रमे यत्नगौरवात् । अर्थप्राप्तस्य व्युत्थानस्य पुनर्वचनाद्विदुषः कर्तव्यत्वोपपत्तिः । अविदुषापि मुमुक्षुणां पारिव्राज्यं विविदिषा- कर्तव्यमेव । तथा संन्यासविधानम् च “शान्तो दान्तः” (बृ० उ० ४ । ४ । २३) इत्यादिवचनं प्रमाणम् । शमदमादीनां चात्मदर्शन साधनानामन्याश्रमेष्वनुपपत्तेः । “अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसङ्घजुष्टम्” (६ । २१) इति च श्वेताश्वतरे विज्ञायते । “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” (कैवल्य० २) इति च कैवल्यश्रुतिः । “ज्ञात्वा नैष्कर्म्यमाचरेत्” इति च स्मृतेः । “ब्रह्माश्रमपदे वसेत्” इति च ब्रह्मचर्यादिविद्यासाधनानां च साकल्येनात्याश्रमिषूपपत्तेर्गार्हस्थ्येऽसंभवात् । न चासम्पन्नं साधनं कस्यचिदर्थस्य साधनायालम् । यद्विज्ञानोपयोगीनि च गार्हस्थ्याश्रमकर्माणि तेषां परमफलमुपसंहृतं देवताप्ययलक्षणं संसारविषयमेव । यदि कर्मिण एव परमात्मविज्ञानमभविष्यत् संसारविषयस्यैव फलस्योपसंहारो नोपापत्स्यत् ।
अङ्गफलं तदिति चेन्न । तद्देवताप्ययस्य विरोध्यात्मवस्तुविषयज्ञानाङ्गत्वनिरासः त्वादात्मविद्यायाः । निराकृतसर्वनामरूपकर्मपरमार्थत्मवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वसाधनम् । गुणफलसम्बन्धे हि निराकृतसर्वविशेषात्मवस्तुविषयत्वं ज्ञानस्य न प्राप्नोति । तच्चानिष्टम्, “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” (बृ० उ० २ । ४ । १४) इत्यधिकृत्य क्रियाकारकफलादिसर्वव्यवहारनिराकरणाद्विदुषः । तद्विपरीतस्याविदुषो “यत्र हि द्वैतमिव” (बृ० उ० २ । ४ । १४) इत्युक्त्वा क्रियाकारकफलरूपस्यैव संसारस्य दर्शितत्वाच्च वाजसनेयिब्राह्मणे । तथेहापि देवताप्ययं संसारविषयं यत्फलमशनायादिमद्वस्त्वात्मकं तत्फलमुपसंहृत्य केवलं सर्वात्मकवस्तुविषयं ज्ञानममृतत्वाय वक्ष्यामीति प्रवर्तते ।
ऋणप्रतिबन्धस्याविदुष एव ऋणप्रतिबन्ध- मनुष्यपितृदेवलोकविचारः प्राप्तिं प्रति, न विदुषः । “सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव” (बृ० उ० १ । ५ । १६) इत्यादिलोकत्रयसाधननियमश्रुतेः । विदुषश्च ऋणप्रतिबन्धाभावो दर्शित आत्मलोकार्थिनः “किं प्रजया करिष्यामः” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इत्यादिना । तथा “एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः” इत्यादि । “एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं न जुहवाञ्चक्रुः” (कौषी० २ । ५) इति च कौषीतकिनाम् ।
अविदुषस्तर्हि ऋणानपाकरणे पारिव्राज्यानुपपत्तिरिति चेत्?
न; प्राग्गार्हस्थ्यप्रतिपत्तेर्ऋणित्वासंभवात् । अधिकारानारूढोऽप्यृणी चेत्स्यात् सर्वस्य ऋणित्वमित्यनिष्टं प्रसज्येत । प्रतिपन्नगार्हस्थ्यस्यापि “गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा” (जा० उ० ४) इत्यात्मदर्शनोपायसाधनत्वेनेष्यत एव पारिव्राज्यम् । यावज्जीवादिश्रुतीनायावज्जीवादि- मविद्वदमुमुक्षुविषये श्रुतीनामविद्वद्विषयत्वम् कृतार्थता । छान्दोग्ये च केषांचिद् द्वादशरात्रमग्निहोत्रं हुत्वा तत ऊर्ध्वं परित्यागः श्रूयते ।
यत्त्वनधिकृतानां पारिव्राज्यसंन्यासस्य मिति, तन्न, तेषां कर्मानधिकारि- पृथगेव “उत्सन्नाग्निविषयत्वनिरासः रनग्निको वा” इत्यादिश्रवणात् । सर्वस्मृतिषु चाविशेषेणाश्रमविकल्पः प्रसिद्धः समुच्चयश्च ।
यत्तु विदुषोऽर्थप्राप्तं व्युत्थान- व्युत्थानविधि- मित्यशास्त्रार्थत्वे, विचारः गृहे वने वा तिष्ठतो न विशेष इति, तदसत्; व्युत्थानस्यैवार्थप्राप्तवान्नान्यत्रावस्थानं स्यात् । अन्यत्रावस्थानस्य कामकर्मप्रयुक्तत्वं ह्यवोचाम, तदभावमात्रं व्युत्थानमिति च ।
यथाकामित्वं तु विदुषोऽत्यन्तविदुषो यथा- मप्राप्तमत्यन्तमूढकामित्वनिषेधः विषयत्वेनावगमात् । तथा शास्त्रचोदितमपि कर्म आत्मविदोऽप्राप्तं गुरुभारतयावगम्यते । किमुतात्यन्ताविवेकनिमित्तं यथाकामित्वम् । न हि उन्मादतिमिरदृष्ट्युपलब्धं वस्तु तदपगमेऽपि तथैव स्यात् । उन्मादतिमिरदृष्टिनिमित्तत्वादेव तस्य । तस्मादात्मविदो व्युत्थानव्यतिरेकेण न यथाकामित्वं न चान्यत्कर्तव्यमित्येतत्सिद्धम् ।
यत्तु—“विद्यां चाविद्यां च विदुषो ज्ञानकर्म- यस्तद्वेदोभयग्ँसह” समुच्चयानुपपत्तिः (ई० उ० ११) इति न विद्यावतो विद्यया सहाविद्यापि वर्तते इत्ययमर्थः; कस्तर्हि एकस्मिन्पुरुषे एते एकदैव न सह सम्बध्येयातामित्यर्थः । यथा शुक्तिकायां रजतशुक्तिकाज्ञाने एकस्य पुरुषस्य । “दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता” (क० उ० १ । २ । ४) इति हि काठके । तस्मान्न विद्यायां सत्यामविद्यासम्भवोऽस्ति ।
“तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व” (तै० उ० ३ । २) इत्यादिश्रुतेः, तप आदि विद्योत्पत्तिसाधनं गुरूपासनादि च कर्म अविद्यात्मकत्वादविद्योच्यते तेन विद्यामुत्पाद्य मृत्युं काममतितरति । ततो निष्कामस्त्यक्तैषणो ब्रह्मविद्यया अमृतत्वमश्नुत इत्येतमर्थं दर्शयन्नाह— “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते” (ई० उ० ११) इति ।
यत्तु पुरुषायुः सर्वं कर्मणैव व्याप्तं “कुर्वन्नेवेह उपसंहारः कर्माणि जिजीविषेच्छतग्ँसमाः” (ई० उ० २) इति तदविद्वद्विषयत्वेन परिहृतमितरथासम्भवात् । यत्तु वक्ष्यमाणमपि पूर्वोक्ततुल्यत्वात्कर्मणाविरुद्धमात्मज्ञानमिति, तत्सविशेषनिर्विशेषात्मतया प्रत्युक्तम्, उत्तरत्र व्याख्याने च दर्शयिष्यामः । अतः केवलनिष्क्रियब्रह्मात्मकत्वविद्यादर्शनार्थमुत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते—