अध्याय 1 - श्लोक 26-29

तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखीस्तथा ॥ २६ ॥
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥ २७ ॥
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
दृष्टेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥ २८ ॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥ २९ ॥

tatrāpaśyatsthitān pārthaḥ pitṛnatha pitāmahān .
ācāryānmātulānbhrātṛnputrānpautrānsakhīstathā .. 26 ..
śvaśurānsuhṛdaścaiva senayorubhayorapi .
tānsamīkṣya sa kaunteyaḥ sarvānbandhūnavasthitān .. 27 ..
kṛpayā parayāviṣṭo viṣīdannidamabravīt .
dṛṣṭemaṃ svajanaṃ kṛṣṇa yuyutsuṃ samupasthitam .. 28 ..
sīdanti mama gātrāṇi mukhaṃ ca pariśuṣyati .
vepathaśca śarīre me romaharṣaśca jāyate .. 29 ..


फिर वह पृथापुत्र अर्जुन वहाँ दोनों सेनाओं में खड़े हुए अपने ताऊ, चाचों, दादों, गुरुओं, मामों, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, ससुरों और सुहृद्वर्ग को देखने लगा। वहाँ उन सभी कुटुम्बियों को खड़े हुए देखकर अत्यन्त करुणा से घिरकर वह कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ इस प्रकार कहने लगा, हे कृष्ण! सामने खड़े हुए युद्धेच्छुक स्वजन-समुदाय को देखकर मेरे सब अङ्ग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, मेरे शरीर में कम्प और रोमाञ्च होते हैं ॥ २६—२९ ॥