यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहृतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ ३८ ॥
yadyapyete na paśyanti lobhopahṛtacetasaḥ .
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ mitradrohe ca pātakam .. 38 ..
यद्यपि लोभके कारण जिनका चित्त भ्रष्ट हो चुका है, ऐसे ये कौरव कुलक्षयजनित दोषको और मित्रोंके साथ वैर करनेमें होनेवाले पापको नहीं देख रहे हैं ॥ ३८ ॥