अध्याय 10 - श्लोक 10

मच्चित्ता मयि चित्तं येषां ते मच्चित्ता
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ १० ॥

maccittā mayi cittaṃ yeṣāṃ te maccittā
teṣāṃ satatayuktānāṃ bhajatāṃ prītipūrvakam. dadāmi buddhiyogaṃ taṃ yena māmupayānti te.. 10 ..


उन समस्त बाह्य तृष्णाओं से रहित निरन्तर तत्पर होकर भजन—सेवन करनेवाले पुरुषों को, किसी वस्तु की इच्छा आदि कारणों से भजनेवालों को नहीं, किंतु प्रीतिपूर्वक भजनेवालों को यानी प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवालों को, मैं वह बुद्धियोग देता हूँ। मेरे तत्त्व के यथार्थ ज्ञान का नाम बुद्धि है, उससे युक्त होना ही बुद्धियोग है। वह ऐसा बुद्धियोग मैं (उनको) देता हूँ कि जिस पूर्णज्ञानरूप बुद्धियोग से वे मुझ आत्मरूप परमेश्वर को आत्मरूप से समझ लेते हैं।

वे कौन हैं ? जो ‘मच्चित्ताः’ आदि ऊपर कहे हुए प्रकारों से मेरा भजन करते हैं ॥ १० ॥

आपकी प्राप्ति के कौन-से प्रतिबन्ध के कारण का नाश करनेवाला बुद्धियोग आप उन भक्तों को देते हैं और किसलिये देते हैं ? इस आकांक्षा पर कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

तेषां सततयुक्तानां नित्याभियुक्तानां निवृत्त-सर्वबाह्यैषणानां भजतां सेवमानानाम्, किम् अर्थित्वादिना कारणेन, न इति आह, प्रीतिपूर्वकं प्रीतिः स्नेहः तत्पूर्वकं मां भजताम् इत्यर्थः। ददामि प्रयच्छामि बुद्धियोगं बुद्धिः सम्यग्दर्शनं मत्तत्त्वविषयं तेन योगो बुद्धियोगः तं बुद्धियोगम्। येन बुद्धियोगेन सम्यग्दर्शनलक्षणेन मां परमेश्वरम् आत्मभूतम् आत्मत्वेन उपयान्ति प्रतिपद्यन्ते।

के, ते ये मच्चित्तत्वादिप्रकारैः मां भजन्ते ॥ १० ॥

किमर्थं कस्य वा त्वत्प्राप्तिप्रतिबन्धहेतोः नाशकं बुद्धियोगं तेषां त्वद्भक्तानां ददासि इति आकाङ्क्षायाम् आह—