अध्याय 10 - श्लोक 11

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ ११ ॥

teṣāmevānukampārthamahamajñānajaṃ tamaḥ .
nāśayāmyātmabhāvastho jñānadīpena bhāsvatā .. 11 ..


उन (मेरे भक्तों)-का किसी तरह भी कल्याण हो ऐसा अनुग्रह करने के लिये ही मैं उनके आत्मभाव में स्थित हुआ अर्थात् आत्मा का भाव जो अन्तःकरण है उसमें स्थित हुआ उनके अविवेकजन्य मिथ्या प्रतीतिरूप मोहमय अन्धकार को प्रकाशमय विवेक-बुद्धिरूप ज्ञानदीपक द्वारा नष्ट कर देता हूँ।

अर्थात् जो भक्ति के प्रसादरूप घृत से परिपूर्ण है और मेरे स्वरूप की भावना के अभिनिवेशरूप वायु की सहायता से प्रज्वलित हो रहा है,

जिसमें ब्रह्मचर्य आदि साधनों के संस्कारों से युक्त बुद्धिरूप बत्ती है, आसक्तिरहित अन्तःकरण जिसका आधार है, जो विषयों से हटे हुए और राग-द्वेषरूप कालुष्य से रहित हुए चित्तरूप वायुरहित अपवारक में (ढकने में) स्थित है और जो निरन्तर अभ्यास किये हुए एकाग्रतारूप ध्यानजनित, पूर्ण ज्ञानस्वरूप प्रकाश से युक्त है, उस ज्ञानदीपक द्वारा (मैं उनके मोह का नाश कर देता हूँ) ॥ ११ ॥

ऊपर कही हुई भगवान् की विभूति को और योग को सुनकर अर्जुन बोला—

तात्पर्य पढ़ें

तेषाम् एव कथं नाम श्रेयः स्याद् इति अनुकम्पार्थं दयाहेतोः अहम् अज्ञानजम् अविवेकतो जातं मिथ्याप्रत्ययलक्षणं मोहान्धकारं तमो नाशयामि आत्मभावस्थः आत्मनो भावः अन्तःकरणाशयः तस्मिन् एव स्थितः सन्। ज्ञानदीपेन विवेकप्रत्ययरूपेण।

भक्तिप्रसादस्नेहाभिषिक्तेन मद्भावनाभि- निवेशवातेरितेन ब्रह्मचर्यादिसाधनसंस्कारवत्-

प्रज्ञावर्तिना

विरक्तान्तःकरणाधारेण

विषयव्यावृत्तचित्तरागद्वेषाकलुषितनिवातापवार-

कस्थेन नित्यप्रवृत्तैकाग्र्यध्यानजनितसम्यग्दर्शन-

भास्वता ज्ञानदीपेन इत्यर्थः ॥ ११ ॥

यथोक्तां भगवतो विभूतिं योगं च श्रुत्वा—अर्जुन उवाच—