अध्याय 10 - श्लोक 18

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तूमिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥

vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana.
bhūyaḥ kathaya tūmirhi śṛṇvato nāsti me’mṛtam .. 18 ..


हे जनार्दन ! अपने योग को—अपनी योगैश्वर्यरूप विशेष शक्ति को और विभूति को यानी चिन्तन करनेयोग्य पदार्थों के विस्तार को, विस्तारपूर्वक कहिये।

गमन जिसका कर्म है ऐसी अर्द धातु का रूप जनार्दन है। असुरों को यानी देवों के प्रतिपक्षी मनुष्यों को नरकादि में भेजनेवाले होने से भगवान् का नाम जनार्दन है। अथवा उन्नति और कल्याण—ये दोनों पुरुषार्थरूप प्रयोजन सब लोगों के द्वारा भगवान् से माँगे जाते हैं, इसलिये भगवान् का नाम जनार्दन है—

यद्यपि आप पहले कह चुके हैं तो भी फिर कहिये; क्योंकि आपके मुख से निकले हुए वाक्यरूप अमृत को सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है—संतोष नहीं होता है ॥ १८ ॥

श्रीभगवान् बोले—

तात्पर्य पढ़ें

विस्तरेण आत्मनो योगं योगैश्वर्यशक्ति-विशेषं विभूतिं च विस्तरं ध्येयपदार्थानां हे जनार्दन ।

अर्दते:* गतिकर्मणो रूपम्। असुराणां देवप्रतिपक्षभूतानां जनानां नरकादिगमयितृत्वाद्

जनार्दनः। अभ्युदयनिःश्रेयसपुरुषार्थप्रयोजनं सर्वैः जनैः याच्यते इति वा।

भूयः पूर्वम् उक्तम् अपि कथय तृप्तिः हि परितोषो यस्माद् न अस्ति मे शृण्वतः त्वन्मुख-निःसृतवाक्यामृतम् ॥ १८ ॥