अध्याय 10 - श्लोक 3

किं च—
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

kiṃ ca—
yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram .
asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate .. 3 ..


क्योंकि मैं महर्षियों का और देवों का आदिकारण हूँ, मेरा आदि दूसरा कोई नहीं है, इसलिये मैं अजन्मा और अनादि हूँ। अनादित्व ही जन्मरहित होने में कारण है। इस प्रकार जो मुझे जन्मरहित अनादि और लोकों का महान् ईश्वर अर्थात् अज्ञान और उसके कार्य से रहित (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं से अतीत) चतुर्थ अवस्थायुक्त जानता है, वह (इस प्रकार जाननेवाला) मनुष्यों में ज्ञानी है अर्थात् मोह से रहित श्रेष्ठ पुरुष है और वह जान-बूझकर किये हुए या बिना जाने किये हुए सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ३ ॥

इसलिये भी मैं लोकों का महान् ईश्वर हूँ—

तात्पर्य पढ़ें

यो माम् अजम् अनादिं च यस्माद् अहम् आदिः देवानां महर्षीणां च न मम अन्यः आदिः विद्यते अतः अहम् अजः अनादिः च, अनादित्वम् अजत्वे हेतुः । तं माम् अजम् अनादिं च यो वेत्ति विजानाति लोकमहेश्वरं लोकानां महान्तम् ईश्वरं तुरीयम् अज्ञानतत्कार्यवर्जितम् असम्मूढः सम्मोहवर्जितः स मर्त्येषु मनुष्येषु सर्वपापैः सर्वैः पापैः मतिपूर्वामतिपूर्वकृतैः प्रमुच्यते प्रमोक्ष्यते ॥ ३ ॥

इतः च अहं महेश्वरो लोकानाम्—