अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥
sargāṇāmādirantaśca madhyaṃ caivāhamarjuna .
adhyātmavidyā vidyānāṃ vādaḥ pravadatāmaham .. 32 ..
हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय मैं हूँ। आरम्भ में तो भगवान् ने अपने को केवल चेतनाधिष्ठित प्राणियों का ही आदि, मध्य और अन्त बतलाया है, परंतु यहाँ समस्त जगन्मात्र का आदि, मध्य और अन्त बतलाते हैं, यह विशेषता है।
समस्त विद्याओं में जो कि मोक्ष देनेवाली होने के कारण प्रधान है, वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ। शंका-समाधान करने के समय बोले जानेवाले वाक्यों में जो अर्थनिर्णय का हेतु होने से प्रधान है वह वाद नामक वाक्य मैं हूँ। यहाँ ‘प्रवदताम्’ इस पद से वक्ता द्वारा बोले जानेवाले वाद, जल्प और वितण्डा—इन तीन प्रकार के वचन-भेदों का ही ग्रहण है (बोलने वालों का नहीं) ॥ ३२ ॥
तात्पर्य पढ़ें
सृष्टीनाम् आदिः अन्तः च मध्यं च एव अहम् उत्पत्तिस्थितिलया अहम् अर्जुन। भूतानां जीवाधिष्ठितानाम् एव आदिः अन्तः च इत्यादि उक्तम् उपक्रमे, इह तु सर्वस्य एव सर्गमात्रस्य इति विशेषः।
अध्यात्मविद्या विद्यानां मोक्षार्थत्वात् प्रधानम् अस्मि । वादः अर्थनिर्णयहेतुत्वात् प्रवदतां प्रधानम् अतः सः अहम् अस्मि । प्रवक्तृद्वारेण वदनभेदानाम् एव वादजल्पवितण्डानाम् इह ग्रहणं प्रवदताम् इति ॥ ३२ ॥