अध्याय 10 - श्लोक 5

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥

ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo’yaśaḥ .
bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ .. 5 ..


अहिंसा—प्राणियों को किसी प्रकार पीड़ा न पहुँचाना, समता—चित्त का समभाव, संतोष—जो कुछ मिले उसी को यथेष्ट समझना, तप—इन्द्रियसंयमपूर्वक शरीर को सुखाना, दान—अपनी शक्ति के अनुसार धन का विभाग करना (दूसरों को बाँटना), यश—धर्म के निमित्त से होनेवाली कीर्ति, अपयश—अधर्म के निमित्त से होनेवाली अपकीर्ति।

इस प्रकार जो प्राणियों के अपने-अपने कर्मों के अनुसार होनेवाले बुद्धि आदि नाना प्रकार के भाव हैं, वे सब मुझ ईश्वर से ही होते हैं ॥ ५ ॥

तथा—

तात्पर्य पढ़ें

अहिंसा अपीडा प्राणिनाम् । समता समचित्तता । तुष्टिः सन्तोषः पर्याप्तबुद्धिः लाभेषु । तप इन्द्रियसंयमपूर्वकं शरीरपीडनम् । दानं यथाशक्ति संविभागः । यशो धर्मनिमित्ता कीर्तिः । अयशः तु अधर्मनिमित्ता अकीर्तिः ।

भवन्ति भावा यथोक्ता बुद्ध्यादयो भूतानां प्राणिनां मत्त एव ईश्वरात् पृथग्विधा नानाविधाः स्वकर्मानुरूपेण ॥ ५ ॥