सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥ ७ ॥
etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca mama yo vetti tattvataḥ .
so’vikampena yogena yujyate nātra saṃśayaḥ .. 7 ..
मेरी इस उपर्युक्त विभूति को अर्थात् विस्तार को और योग–युक्ति को अर्थात् अपनी मायिक घटना को, अथवा योग से उत्पन्न हुई सर्वज्ञतारूप सामर्थ्य को जो कि योग–शब्द से कही जाती है, जो तत्त्व से—यथार्थ जानता है।
वह पुरुष पूर्ण ज्ञान की स्थिरतारूप निश्चल योग से युक्त हो जाता है, इस विषय में (कुछ भी) संशय नहीं है ॥ ७ ॥
किस प्रकार के अविचल योग से युक्त हो जाता है? सो कहा जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
एतां यथोक्तां विभूतिं विस्तारं योगं च युक्तिं च आत्मनो घटनम् अथवा योगैश्वर्यसामर्थ्यं सर्वज्ञत्वं योगजं योग उच्यते। मम मदीयं यो वेत्ति तत्त्वतः तत्त्वेन यथावद् इति एतत्।
सः अविकम्पेन अप्रचलितेन योगेन सम्यग्दर्शनस्थैर्यलक्षणेन युज्यते सम्बध्यते न अत्र संशयो न अस्मिन् अर्थे संशयः अस्ति ॥ ७ ॥
कीदृशेन अविकम्पेन योगेन युज्यते इति उच्यते—
१-भृगु, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ—ये सात महर्षि हैं।
२-मनु १४ हैं, पर चार मनु सावर्ण नाम से प्रसिद्ध हैं—सावर्णि, धर्मसावर्णि, दक्षसावर्णि और सावर्ण ।