दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni duṣṭvaiva kālānalasannibhāni .
diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa .. 25 ..
दाढ़ों से युक्त भयंकर—विकराल आकृतिवाले और कालाग्नि के समान अर्थात् प्रलयकाल में लोकों को भस्मीभूत करनेवाली जो कालाग्नि है, उसके समान आपके मुखों को देखकर मैं इन दिशाओं को पूर्व और पश्चिम के विवेकपूर्वक नहीं जानता हूँ अर्थात् मुझे दिग्भ्रम हो गया है। इसीसे (आपके स्वरूप का दर्शन करते हुए भी) मुझे विश्राम—सुख नहीं मिल रहा है, सो हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइये ॥ २५ ॥
जिन शूरवीरों से मुझे पहले पराजय की आशङ्का थी, वह भी अब चली गयी; क्योंकि—
तात्पर्य पढ़ें
दंष्ट्राकरालानि दंष्ट्राभिः करालानि विकृतानि ते तव मुखानि दृष्ट्वा एव उपलभ्य कालानलसन्निभानि प्रलयकाले लोकानां दाहकः अग्निः कालानलः तत्सन्निभानि कालानलसदृशानि दृष्ट्वा इति एतत् । दिशः पूर्वापरविवेकेन न जाने दिङ्मूढो जातः अस्मि, अतः न लभे च न उपलभे च शर्म सुखम् अतः प्रसीद प्रसन्नो भव हे देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥
येभ्यो मम पराजयाशङ्का आसीत् सा च अपगता यतः—