मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥
droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ ca karṇaṃ tathānyānapi yodhavīrān.
mayā hatāṃstvaṃ jahi mā vyathiṣṭhā yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān.. 34 ..
द्रोण आदि जिन-जिन शूरवीरों से अर्जुन को आशङ्का थी (जिनके कारण पराजय होनेका डर था) उन-उनका नाम लेकर भगवान् कहते हैं कि ‘तू मुझसे मारे हुओं को मार’ इत्यादि।
उनमें से द्रोण और भीष्म से भय होनेका कारण प्रसिद्ध ही है; क्योंकि द्रोण तो धनुर्वेद के आचार्य दिव्य अस्त्रों से युक्त और विशेषरूप से अपने सर्वोत्तम गुरु हैं तथा भीष्म सबसे बड़े स्वेच्छा-मृत्यु और दिव्य अस्त्रों से सम्पन्न हैं जो कि परशुरामजी के साथ द्वन्द्व युद्ध करनेपर भी उनसे पराजित नहीं हुए।
वैसा ही जयद्रथ भी है जिसका पिता इस उद्देश्य से तप कर रहा है कि ‘जो कोई मेरे पुत्र का सिर भूमि पर गिरावेगा, उसका भी सिर गिर जायगा।’
कर्ण भी (बड़ा शूरवीर है); क्योंकि वह इन्द्र द्वारा दी हुई अमोघ शक्ति से युक्त है और कन्या से जन्मा हुआ सूर्य का पुत्र है, इसलिये उसके नाम का भी निर्देश किया गया है।
(अभिप्राय यह कि द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्यान्य शूरवीर योद्धा) जो कि मेरे द्वारा मारे हुए हैं, उनको तू निमित्तमात्र से मार, उनसे भय मत कर। युद्ध कर, तू संग्राम में दुर्योधनादि शत्रुओं को जीतेगा ॥ ३४ ॥
संजय बोले—
तात्पर्य पढ़ें
द्रोणं च येषु येषु योधेषु अर्जुनस्य आशङ्का तान् तान् व्यपदिशति भगवान् मया हतान् इति।
तत्र द्रोण भीष्मयोः तावत् प्रसिद्धम् आशङ्काकारणं द्रोणो धनुर्वेदाचार्यो दिव्यास्त्रसम्पन्न आत्मनः च विशेषतो गुरुः गरिष्ठो भीष्मः स्वच्छन्दमृत्युः दिव्यास्त्रसम्पन्नः च परशुरामेण द्वन्द्वयुद्धम् अगमद् न च पराजितः ।
तथा जयद्रथो यस्य पिता तपः चरति मम पुत्रस्य शिरो भूमौ पातयिष्यति यः तस्य अपि शिरः पतिष्यति इति।
कर्णः अपि वासवदत्तया शक्त्या तु अमोघया सम्पन्नः सूर्यपुत्रः कानीनो यतः अतः तन्नाम्ना एव निर्देशः ।
मया हतान् त्वं जहि निमित्तमात्रेण मा व्यथिष्ठाः तेभ्यो भयं मा कार्षीः। युध्यस्व जेतासि दुर्योधनप्रभृतीन् रणे युद्धे सपत्नान् शत्रून् ॥ ३४ ॥