एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥
sañjaya uvāca—
etacchrutvā vacanaṃ keśavasya kṛtāñjalirvepamānaḥ kirīṭī .
namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇaṃ sagadgadaṃ bhītabhītaḥ praṇamya .. 35 ..
केशव के इन उपर्युक्त वचनों को सुनकर अर्जुन काँपते हुए हाथ जोड़कर नमस्कार करके फिर श्रीकृष्ण से इस प्रकार गद्गद वाणी से बोले।
जब दुःख प्राप्त होने के कारण भयभीत पुरुष के और हर्षोत्पत्ति के कारण स्नेहयुक्त पुरुष के नेत्र आँसुओं से परिपूर्ण हो जाते हैं और कण्ठ कफ से रुक जाता है, उस समय जो वाणी में अपटुता और शब्द में मन्दता हो जाती है, उसका नाम गद्गद है, जो उससे युक्त थे ऐसे सगद्गद वचन बोले। यहाँ ‘सगद्गद’ शब्द बोलनारूप क्रिया का विशेषण है। इस प्रकार भयभीत—भय से बारंबार विह्वलचित्त हुए प्रणाम करके अत्यन्त नम्र होकर बोले।
यहाँ पर संजय के वचन इस गूढ़ अभिप्राय से भरे हुए हैं कि द्रोणादि चार अजेय शूरवीरों का अर्जुन के द्वारा नाश हो जाने पर आश्रयरहित दुर्योधन तो मरा हुआ ही है, ऐसा मानकर विजय से निराश हुआ धृतराष्ट्र सन्धि कर लेगा और उससे दोनों पक्षवालों की शान्ति हो जायगी। परंतु भावी के वश में होकर धृतराष्ट्र ने ऐसे वचन भी नहीं सुने ॥ ३५ ॥
तात्पर्य पढ़ें
एतत् श्रुत्वा वचनं केशवस्य पूर्वोक्तं कृताञ्जलिः सन् वेपमानः कम्पमानः किरीटी नमस्कृत्वा भूयः पुनः एव आह उक्तवान् कृष्णं सगद्गदम्।
भयाविष्टस्य दुःखाभिघातात् स्नेहाविष्टस्य च हर्षोद्भवाद् अश्रुपूर्णनेत्रत्वे सति श्लेष्मणा कण्ठावरोधः ततः च वाचः अपाटवं मन्दशब्दत्वं यत् स गद्गदः तेन सह वर्तते इति सगद्गदं वचनम् आह इति । वचनक्रियाविशेषणम् एतत् । भीतभीतः पुनः पुनः भयाविष्टचेताः सन् प्रणम्य प्रह्वी भूत्वा आह इति व्यवहितेन सम्बन्धः ।
अत्र अवसरे सञ्जयवचनं साभिप्रायम्। कथम्, द्रोणादिषु अर्जुनेन निहतेषु अजेयेषु चतुर्षु निराश्रयो दुर्योधनो निहत एव इति मत्वा धृतराष्ट्रो जयं प्रति निराशः सन् सन्धिं करिष्यति ततः शान्तिः उभयेषां भविष्यति इति। तद् अपि न अश्रौषीद् धृतराष्ट्रो भवितव्यवशात् ॥ ३५ ॥