स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्गः ॥ ३६ ॥
arjuna uvāca—
sthāne hṛṣīkeśa tava prakīrtyā jagatprahṛṣyatyanurajyate ca .
rakṣāṃsi bhītāni diśo dravanti sarve namasyanti ca siddhasaṅgaḥ .. 36 ..
यह उचित ही है। वह क्या? कि हे हृषीकेश! आपकी कीर्ति से अर्थात् आपकी महिमा का कीर्तन और श्रवण करने से जो जगत् हर्षित हो रहा है सो उचित ही है।
अथवा ‘स्थाने’ यह शब्द विषय का विशेषण भी समझा जा सकता है। भगवान् हर्ष आदिके विषय हैं, यह मानना भी ठीक ही है; क्योंकि ईश्वर सबका आत्मा और सब भूतों का सुहृद् है।
यहाँ ऐसी व्याख्या करनी चाहिये कि जगत् जो भगवान् में अनुराग—प्रेम करता है, यह उसका अनुराग करना उचित विषय में ही है तथा राक्षसगण भय से युक्त हुए सब दिशाओं में भाग रहे हैं, यह भी ठीक—ठिकाने की ही बात है। एवं समस्त कपिलादि सिद्धोंके समुदाय जो नमस्कार कर रहे हैं, यह भी उचित विषय में ही है ॥ ३६ ॥
भगवान् हर्षादि भावोंके योग्य स्थान किस प्रकार हैं ? इसमें कारण दिखाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
स्थाने युक्तं किं तत्, तव प्रकीर्त्या त्वन्माहात्म्यकीर्तनेन श्रुतेन हे हृषीकेश यद् जगत् प्रहृष्यति प्रहर्षम् उपैति स्थाने तद् युक्तम् इत्यर्थः ।
अथवा विषयविशेषणं स्थाने इति, युक्तो हर्षादिविषयो भगवान्। यत ईश्वरः सर्वात्मा सर्वभूतसुहृत् च इति।
तथा अनुरज्यते अनुरागं च उपैति तत् च विषये इति व्याख्येयम् । किं च रक्षांसि भीतानि भयाविष्टानि दिशो द्रवन्ति गच्छन्ति तत् च स्थाने विषये । सर्वे नमस्यन्ति नमस्कुर्वन्ति च सिद्धसङ्घाः सिद्धानां समुदायाः कपिलादीनां तत् च स्थाने ॥ ३६ ॥
भगवतो हर्षादिविषयत्वे हेतुं दर्शयति—