अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
kasmācca te na nameranmahātman garīyase brahmaṇo’pyādikartre
ananta deveśa jagannivāsa tvamakṣaraṃ sadasattatparaṃ yat .. 37 ..
हे महात्मन्! आप जो अतिशय गुरुतर हैं अर्थात् सबसे बड़े हैं, उनको ये सब किसलिये नमस्कार न करें; क्योंकि आप हिरण्यगर्भ के भी आदिकर्ता—कारण हैं, अतः आप आदिकर्ता को कैसे नमस्कार न करें। अभिप्राय यह कि उपर्युक्त कारण से आप हर्षादि के और नमस्कार के योग्य पात्र हैं।
हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! वह परम अक्षर (ब्रह्म) आप ही हैं, जो वेदान्तों में सुना जाता है।
वह क्या है? सत् और असत्—जो विद्यमान है वह सत् और जिसमें ‘नहीं है’ ऐसी बुद्धि होती है वह असत् है। वे दोनों सत् और असत् जिस अक्षर की उपाधि हैं, जिनके कारण वह ब्रह्म उपचार से ‘सत् और असत्’ कहा जाता है; परंतु वास्तव में जो सत् और असत् दोनों से परे है, जिसको वेदवेत्ता लोग अक्षर कहते हैं वह ब्रह्म भी आप ही हैं। अभिप्राय यह कि आपसे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है ॥ ३७ ॥
अर्जुन फिर भी स्तुति करता है—
तात्पर्य पढ़ें
कस्मात् च हेतोः ते तुभ्यं न नमेरन् न नमस्कुर्युः हे महात्मन् गरीयसे गुरुतराय यतो ब्रह्मणो हिरण्यगर्भस्य अपि आदिकर्ता कारणम् अतः तस्माद् आदिकर्त्रे कथम् एते न नमस्कुर्युः । अतो हर्षादीनां नमस्कारस्य च स्थानं त्वम् अर्हो विषय इत्यर्थः ।
हे अनन्त देवेश जगन्निवास त्वम् अक्षरं तत् परं यद् वेदान्तेषु श्रूयते।
किं तत्, सद् असद् विद्यमानम् असत् च यत्र नास्ति इति बुद्धिः ते उपधानभूते सदसती यस्य अक्षरस्य, यद्द्वारेण सद् असद् इति उपचर्यते। परमार्थतः तु सदसतः परं तद् यद् अक्षरं वेदविदो वदन्ति तत् त्वम् एव न अन्यद् इति अभिप्रायः ॥ ३७ ॥
पुनः अपि स्तौति—