वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥
tvamādidevaḥ puruṣaḥ purāṇastvamasya viśvasya paraṃ nidhānam.
vettāsi vedyaṃ ca paraṃ ca dhāma tvayā tataṃ viśvamanantarūpa .. 38 ..
आप जगत् के रचयिता होने के कारण आदिदेव हैं और शरीररूप पुर में रहने के कारण सनातन पुरुष हैं तथा आप ही इस विश्व के परम उत्तम स्थान हैं अर्थात् महाप्रलयादि में समस्त जगत् जिसमें स्थित होता है वह (जगत् का आश्रय) आप ही हैं।
तथा समस्त जाननेयोग्य वस्तुओं के आप जाननेवाले हैं और जो जाननेयोग्य हैं वह भी आप ही हैं। आप ही परम धाम—परम वैष्णवपद हैं। हे अनन्तरूप! समस्त विश्व आपसे परिपूर्ण है—व्याप्त है। आपके रूपों का अन्त नहीं है ॥ ३८ ॥
तात्पर्य पढ़ें
त्वम् आदिदेवो जगतः स्रष्टृत्वात् पुरुषः पुरि शयनात्, पुराणः चिरन्तनः त्वम् एव अस्य विश्वस्य परं प्रकृष्टं निधानं निधीयते अस्मिन् जगत् सर्वं महाप्रलयादौ इति।
किं च वेत्ता असि वेदिता असि सर्वस्य एव वेद्यजातस्य । यत् च वेद्यं वेदनार्हं तत् च असि । परं च धाम परमं पदं वैष्णवम् । त्वया ततं व्याप्तं विश्वं समस्तम् अनन्तरूप अन्तो न विद्यते तव रूपाणाम् ॥ ३८ ॥