तथा—
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व। अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
bahuśo namaskārakriyābhyāsāvṛttigaṇanaṃ
tathā—
namaḥ purastādatha pṛṣṭhataste namo’stu te sarvata eva sarva. anantavīryāmitavikramastvaṃ sarvaṃ samāpnoṣi tato’si sarvaḥ .. 40 ..
आपको आगे से अर्थात् पूर्व दिशा में और पीछे से भी नमस्कार है। हे सर्वरूप! आपको सब ओर से नमस्कार है अर्थात् सर्वत्र स्थित हुए आपको सब दिशाओं में नमस्कार है। आप अनन्तवीर्य और अपार पराक्रम वाले हैं।
वीर्य सामर्थ्य को कहते हैं और विक्रम पराक्रम को। कोई व्यक्ति सामर्थ्यवान् होकर भी शस्त्रादि चलाने में पराक्रम नहीं दिखा सकता, अथवा मन्दपराक्रमी होता है। परंतु आप तो अनन्तवीर्य और अमित पराक्रम से युक्त हैं। इसलिये आप अनन्तवीर्य और अमितपराक्रमी हैं।
आप अपने एक स्वरूप से सारे जगत् को व्याप्त किये हुए स्थित हैं, इसलिये आप सर्वरूप हैं, अर्थात् आप से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ॥ ४० ॥
क्योंकि मैं आपकी महिमा को न जानने का अपराधी रहा हूँ, इसलिये—
तात्पर्य पढ़ें
नमः पुरस्तात् पूर्वस्यां दिशि तुभ्यम् अथ पृष्ठतः ते पृष्ठतः अपि च ते। नमः अस्तु ते सर्वत एव सर्वासु दिक्षु सर्वत्र स्थिताय हे सर्व अनन्तवीर्यामितविक्रमः अनन्तं वीर्यम् अस्य अमितो विक्रमः अस्य।
वीर्यं सामर्थ्यं विक्रमः पराक्रमः। वीर्यवान् अपि कश्चित् शस्त्रादिविषये न पराक्रमते मन्दपराक्रमो वा। त्वं तु अनन्तवीर्यः अमितविक्रमः च इति अनन्तवीर्यामितविक्रमः।
सर्वं समस्तं जगत् समाप्नोषि सम्यग् एकेन आत्मना व्याप्नोषि यतः तस्माद् असि भवसि सर्वः, त्वया विना भूतं न किञ्चिद् अस्ति इत्यर्थः ॥ ४० ॥
यतः अहं त्वन्माहात्म्यापरिज्ञानापराधी अतः—