न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कृतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
pitāsi lokasya carācarasya tvamasya pūjyaśca gururgarīyān .
na tvatsamo’styabhyadhikaḥ kṛto’nyo lokatraye’pyapratimaprabhāva .. 43 ..
इस स्थावर-जंगमरूप समस्त जगत्के यानी प्राणिमात्रके उत्पन्न करनेवाले पिता हैं। केवल पिता ही नहीं, आप पूजनीय भी हैं, क्योंकि आप बड़े-से-बड़े गुरु हैं।
आप कैसे गुरुतर हैं सो (अर्जुन) बतलाता है— हे अप्रतिमप्रभाव! सारी त्रिलोकीमें आपके समान दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि अनेक ईश्वर मान लेनेपर व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये ईश्वर दो नहीं हो सकते। जब कि सारे त्रिभुवनमें आपके समान ही दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कोई हो ही कैसे सकता है?
जिससे किसी वस्तुकी समानता की जाय उसका नाम ‘प्रतिमा’ है, जिन आपके प्रभावकी कोई प्रतिमा नहीं है, वह आप अप्रतिमप्रभाव हैं। इस प्रकार हे अप्रतिमप्रभाव! अर्थात् हे निरतिशयप्रभाव!॥ ४३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
पिता असि जनयिता असि लोकस्य प्राणिजातस्य चराचरस्य स्थावरजङ्गमस्य, न केवलं त्वम् अस्य जगतः पिता पूज्यः च पूजार्हो यतो गुरुः गरीयान् गुरुतरः।
कस्माद् गुरुतरः त्वम् इति आह—
न च त्वत्समः त्वत्तुल्यः अन्यः अस्ति। न हि ईश्वरद्वयं सम्भवति अनेकेश्वरत्वे व्यवहारानुपपत्तेः। त्वत्सम एव तावद् अन्यो न सम्भवति कुत एव अन्यः अभ्यधिकः स्यात्। लोकत्रये अपि सर्वस्मिन् अप्रतिमप्रभाव।
प्रतिमीयते यया सा प्रतिमा, न विद्यते प्रतिमा यस्य तव प्रभावस्य स त्वम् अप्रतिम-प्रभावः, हे अप्रतिमप्रभाव निरतिशयप्रभाव इत्यर्थः ॥ ४३ ॥