तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
mayā prasannena tavārjunedaṃ rūpaṃ paraṃ darśitamātmayogāt .
tejomayaṃ viśvamanantamādyaṃ yanme tvadanyena na dṛṣṭapūrvam .. 47 ..
हे अर्जुन! प्रसन्न हुए मुझ परमात्मा ने—तुझ पर जो अनुग्रहबुद्धि है उसका नाम प्रसाद है, उससे युक्त मुझ परमेश्वर ने—अपने ऐश्वर्य की सामर्थ्य से यह परम श्रेष्ठ तेजोमय—तेज से परिपूर्ण अनन्त—अन्तरहित सबसे पहले होनेवाला अनादि विश्वरूप तुझे दिखाया है, जो मेरा रूप तेरे सिवा पहले और किसी से भी नहीं देखा गया ॥ ४७ ॥
मेरे रूप का दर्शन करके तू निःसंदेह कृतार्थ हो गया है। इस प्रकार उस रूप-दर्शन की स्तुति करते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
मया प्रसन्नेन प्रसादो नाम त्वयि अनुग्रहबुद्धिः तद्वता प्रसन्नेन मया तव हे अर्जुन इदं पदं रूपं विश्वरूपं दर्शितम् आत्मयोगाद् आत्मन ऐश्वर्यस्य सामर्थ्यात् तेजोमयं तेजःप्रायं विश्वं समस्तम् अनन्तम् अन्तरहितम् आदौ भवम् आद्यं यद् रूपम् मे मम त्वदन्येन त्वत्तः अन्येन केनचिद् न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
आत्मनो मम रूपदर्शनेन कृतार्थ एव त्वं संवृत्त इति तत् स्तौति—