नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
nāhaṃ vedairna tapasā na dānena na cejyayā.
śakya evaṃvidho draṣṭuṃ dṛṣṭavānasi māṃ yathā .. 53 ..
जिस प्रकार मुझे तूने देखा है ऐसे पहले दिखलाये हुए रूपवाला मैं न तो ऋक्, यजु, साम और अथर्व आदि चारों वेदोंसे, न चान्द्रायण आदि उग्र तपोंसे, न गौ, भूमि तथा सुवर्ण आदिके दानसे और न यजनसे ही देखा जा सकता हूँ अर्थात् यज्ञ या पूजासे भी मैं (इस प्रकार) नहीं देखा जा सकता ॥ ५३ ॥
तो फिर आपके दर्शन किस प्रकार हो सकते हैं ? इसपर कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
न अहं वेदैः ऋग्यजुःसाम अथर्ववेदैः चतुर्भिः अपि न तपसा उग्रेण चान्द्रायणादिना न दानेन गोभूहिरण्यादिना न च इज्यया यज्ञेन पूजया वा शक्य एवंविधो यथादर्शितप्रकारो द्रष्टुं दृष्टवान् असि मां यथा त्वम् ॥ ५३ ॥
कथं पुनः शक्य इति उच्यते—