अध्याय 11 - श्लोक 55

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥

matkarmakṛnmatparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ .
nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava .. 55 ..


जो मुझ परमेश्वर के लिये कर्म करनेवाला है और मेरे ही परायण है—सेवक स्वामी के लिये कर्म करता है, परंतु मरने के पश्चात् पानेयोग्य अपनी परमगति उसे नहीं मानता और यह तो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला और मुझे ही अपनी परमगति समझनेवाला होता है, इस प्रकार जिसकी परमगति मैं ही हूँ ऐसा जो मत्परायण है।

तथा मेरा ही भक्त है अर्थात् जो सब प्रकार से सब इन्द्रियों द्वारा सम्पूर्ण उत्साह से मेरा ही भजन करता है, ऐसा मेरा भक्त है।

तथा जो धन, पुत्र, मित्र, स्त्री और बन्धुवर्ग में सङ्ग—प्रीति—स्नेह से रहित है।

तथा सब भूतों में वैरभाव से रहित है अर्थात् अपना अत्यन्त अनिष्ट करने की चेष्टा करनेवालों में भी जो शत्रुभाव से रहित है।

ऐसा जो मेरा भक्त है, हे पाण्डव! वह मुझे पाता है अर्थात् मैं ही उसकी परमगति हूँ, उसकी दूसरी कोई गति कभी नहीं होती। यह मैंने तुझे तेरे जानने के लिये इष्ट उपदेश दिया है ॥ ५५ ॥

दूसरे अध्याय से लेकर विभूतियोग तक अर्थात् दसवें अध्याय तक समस्त विशेषणों से रहित अक्षरब्रह्म परमात्मा की उपासना का वर्णन किया गया है।

तथा उन्हीं अध्यायों में स्थान-स्थान पर सम्पूर्ण योग-ऐश्वर्य और सम्पूर्ण ज्ञान-शक्ति से युक्त, सत्त्वगुणरूप उपाधिवाले आप परमेश्वर की उपासना का भी वर्णन किया गया है।

तथा विश्वरूप (एकादश) अध्याय में आपने उपासना के लिये ही मुझे सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त, सबका आदि और समस्त जगत् का आत्मारूप अपना विश्वरूप भी दिखलाया है और वह रूप दिखलाकर आपने ‘मेरे ही लिये कर्म करनेवाला हो’ इत्यादि वचन भी कहे हैं। इसलिये इन दोनों पक्षों में कौन-सा पक्ष श्रेष्ठतर है, यह जानने की इच्छा से मैं आपसे पूछता हूँ। इस प्रकार अर्जुन बोले—

तात्पर्य पढ़ें

मत्कर्मकृद् मदर्थं कर्म मत्कर्म तत्करोति इति मत्कर्मकृत्। मत्परमः करोति भृत्यः स्वामिकर्म न तु आत्मनः परमा प्रेत्य गन्तव्या गतिः इति स्वामिनं प्रतिपद्यते, अयं तु मत्कर्मकृद् माम् एव परमां गतिं प्रतिपद्यते इति मत्परमः अहं परमः परा गतिः यस्य सः अयं मत्परमः।

तथा मद्भक्तो माम् एव सर्वप्रकारैः सर्वात्मना

सर्वोत्साहेन भजते इति मद्भक्तः।

सङ्गवर्जितो धनपुत्रमित्रकलत्रबन्धुवर्गेषु सङ्गवर्जितः सङ्गः प्रीतिः स्नेहः तद्वर्जितः।

निर्वैरो निर्गतवैरः सर्वभूतेषु शत्रुभावरहित

आत्मनः अत्यन्तापकारप्रवृत्तेषु अपि ।

य ईदृशो मद्भक्तः स माम् एति अहम् एव तस्य परा गतिः न अन्या गतिः काचिद् भवति अयं तव उपदेश इष्टो मया उपदिष्टो हे पाण्डव इति ॥ ५५ ॥

द्वितीयप्रभृतिषु अध्यायेषु विभूत्यन्तेषु परमात्मनो ब्रह्मणः अक्षरस्य विध्वस्तसर्व-विशेषणस्य उपासनम् उक्तम्।

सर्वयोगैश्वर्यसर्वज्ञानशक्तिमत्सत्त्वोपाधेः

ईश्वरस्य तव च उपासनं तत्र तत्र उक्तम् ।

विश्वरूपाध्याये तु ऐश्वरम् आद्यं समस्त-जगदात्मरूपं विश्वरूपं त्वदीयं दर्शितम् उपासना-अर्थम् एव त्वया, तत् च दर्शयित्वा उक्तवान् असि ‘मत्कर्मकृत्’ इत्यादि, अतः अहम् अनयोः उभयोः पक्षयोः विशिष्टतरबुभुत्सया त्वां पृच्छामि इति—

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्र्यां संहितायां वैयासिक्यां भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे विश्वरूपदर्शनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकरभगवतः

कृतौ श्रीभगवद्गीताभाष्ये विश्वरूपदर्शनं

नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥